राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 28 सितम्बर। ” हम बाहर के पदार्थ की सफाई के लिए काफी समय लगते हैं किंतु अपने भीतर की सफाई की ओर ध्यान नहीं देते। हम अपने भीतर की सफाई के लिए इतने उदासीन क्यों हैँ? भीतर की सफाई ही हमारे काम आएगी और हमें मोक्ष मार्ग की ओर ले जाएगी। ” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मौलिकप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री मौलिकप्रभ सागर जी ने फरमाया कि हमें रात्रि में स्नान नहीं करना चाहिए। रात्रि में भोजन भी नहीं करना चाहिए। पदार्थ के प्रति आसक्ति ही हमारी जीवन की सबसे बड़ी बाधा है। यही आसक्ति हमें मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ने से रोकती है। उन्होंने कहा कि हमारे साथ कुछ नहीं जाएगा केवल हमारे कर्म ही हमारे साथ जाएंगे।
मुनि श्री मौलिकप्रभ सागर जी ने कहा कि हमें लॉन में होने वाले सेलिब्रेशन में शामिल नहीं होना चाहिए और नहीं रात्रि को भोजन करना चाहिए। हमारी पदार्थों के प्रति आसक्ति ही हमसे ऐसा कार्य कराती है। हम “दीया” आदि जलते हैं तो उसे ढंककर रखें ताकि कोई जीव उसकी लव से आकर्षित होकर अपने प्राण ना त्याग पाये।
मुनि श्री ने कहा कि हम छोटे-छोटे सेलिब्रेशन के लिए अपने आपको भूल जाते हैं और उसमें इतना रम जाते हैं कि हम इस दुनिया में क्या करने आए हैं, इसकी ऒर ध्यान नहीं दे पाते। कुछ समय का सेलिब्रेशन ही हमारे लिए महत्वपूर्ण हो जाता है जबकि हमारा मोक्ष का मार्ग हमारे लिए गौण हो जाता है। उन्होंने कहा कि हमें अपने लक्ष्य को नहीं भूलना चाहिए और निरंतर लक्ष्य प्राप्ति का प्रयास करते रहना चाहिए।

