पूना महाराष्ट्र (अमर छत्तीसगढ) 11 जुलाई। सच्ची भक्ति व श्रद्धा ही कल्याण का पथ प्रशस्त करती है। अपने देव, गुरू एवं धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास कमजोर नहीं होना चाहिए। यदि हम स्वयं को जिनशासन का आराधक मानते है तो जैनत्व के प्रति हमारी श्रद्धा में भी कभी कमी नहीं आनी चाहिए। हमारी श्रद्धा व आस्था कमजोर होने पर हम जैसा सोचते है वैसा फल नहीं मिलता।
ये विचार शुक्रवार को पूज्य दादा गुरूदेव मरूधर केसरी मिश्रीमलजी म.सा., लोकमान्य संत, शेरे राजस्थान, वरिष्ठ प्रवर्तक पूज्य गुरूदेव श्रीरूपचंदजी म.सा. के शिष्य, मरूधरा भूषण, शासन गौरव, प्रवर्तक पूज्य गुरूदेव श्री सुकन मुनिजी म.सा. के आज्ञानुवर्ती युवा तपस्वी श्री मुकेश मुनिजी म.सा ने श्रीवर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ,बिबवेवाड़ी पूना के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को अपने धर्म के प्रति आस्थावान बने रहने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है। जैन धर्म एवं जिनशासन के प्रति सदा गौरव के भाव महसूस होते रहने चाहिए।
सत्य,अहिंसा का मार्ग दिखाने वाली हमारी जैन संस्कृति दुनिया के लिए आदर्श है। हमारी नई पीढ़ी को जैन संस्कार मिले इसके लिए जिनवाणी श्रवण करने के लिए प्रेरित करना होगा।
धर्मसभा में सेवारत्न हरीश मुनिजी म.सा. ने जीवन में भक्ति व भक्त का महत्व समझाते हुए कहा कि कि जीवन में जो भक्ति के मार्ग पर चलना सहज नहीं है। जो भक्ति करता है वह महापुरूष होता है। भक्ति से भक्त भी भगवान बन जाता है। ऐसे भक्तों को भगवान की तरह पूजा जाता है।
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर हो या तुकाराम, आचार्य सम्राट आनंदऋषिजी म.सा., मरूधर केसरी मिश्रीमलजी म.सा.,लोकमान्य प्रवर्तक रूपचंदजी म.सा. सभी ने भक्ति के मार्ग पर बढ़कर ही अपने जीवन को निखारा ओर संवारा। हमारी भक्ति उस चंदना की तरह हो जो महावीर को अपने द्वार पर बुला ले। भक्ति सच्ची होगी तो परमात्मा के दर्शन अवश्य होंगे।
युवारत्न श्री नानेशमुनिजी म.सा. ने कहा कि समय के महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि समय बड़ा बलवान होता है और बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता।

चातुर्मास के रूप में धर्म आराधना का जो समय हमे मिला है उसे व्यर्थ में मत जाने देना और स्वयं आने के साथ दूसरों को भी स्थानक में जिनवाणी सुनने के लिए आने को प्रेरित करना है। जिनवाणी श्रवण से आत्मकल्याण की राह खुलती है।
प्रज्ञारत्न श्री हितेशमुनिजी म.सा. ने कहा कि सुख-दुःख दोनों प्रतिपक्षी एवं विपरीत होने से एक साथ कभी नहीं रह सकते। हर व्यक्ति सुख तो पाना चाहता है लेकिन कर्म ऐसे करता है जो दुःख का कारण बन जाते है। यदि हम सुख चाहते है तो अपने कर्म भी उसी अनुरूप करने होंगे।
सद्कर्म और धर्म की आराधना किए बिना सच्चे सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्मसभा में प्रार्थनार्थी श्री सचिनमुनिजी म.सा. का भी सानिध्य प्राप्त हुआ। धर्मसभा में अतिथियों का स्वागत श्री बिबवेवाड़ी श्रीसंघ द्वारा किया गया।
नियमित प्रवचन सुबह 8.45 से 9.45 बजे तक होंगे। प्रतिदिन दोपहर 3 से 5 बजे तक का समय धर्मचर्चा के लिए रहेगा। सूर्यास्त के बाद प्रतिक्रमण होगा। भाईयों के लिए रात्रि धर्म चर्चा का समय रात 8 बजे से रहेगा। प्रत्येक रविवार को दोपहर 2.30 से 4 बजे तक बच्चों के लिए धार्मिक शिविर का आयोजन होगा।

चातुर्मास में त्याग तपस्या का दौर प्रारंभ
चातुर्मास में युवा तपस्वी श्री मुकेश मुनिजी म.सा. आदि ठाणा 5 के सानिध्य में त्याग तपस्याओं का दौर भी शुरू हो गया है। तेला तप की लड़ी शुरू हुई है तो आयम्बिल तप की लड़ी भी प्रारंभ है। संतप्रवर अधिकाधिक श्रावक-श्राविकाओं को तप त्याग के मार्ग से जुड़ने की प्रेरणा प्रदान कर रहे है।
चातुर्मास में श्रावकों एवं युवाओं के लिए रोजाना रात 8.30 से 9 बजे तक प्रार्थनार्थी सचिन मुनिजी म.सा. के सानिध्य में भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति वाले 44 श्लोक के श्री कल्याण-मंदिरस्रोत अनुष्ठान का आयोजन हो रहा है।
(अरिहन्त मीडिया एंड कम्युनिकेशन )

