राजनांदगांव (अमर छत्तीसगढ) 12 जुलाई। आध्यात्म की शुरुआत परोपकार से होती है और इसका अंत भी परोपकार से होता है। दरअसल परोपकार से आत्मा की संरक्षा का मार्ग प्रशस्त होता है। उक्त उदगार आज मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने अपने प्रवचन में व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि परोपकार पर अर्थात दूसरों का उपकार नहीं बल्कि स्वयं का उपकार होता है। व्यक्ति दोषी नहीं होता बल्कि उसका आचार – व्यवहार, राग,दोषी होता है।आचार – व्यवहार को बदला जा सकता है। व्यक्ति को बदला जा सकता है।
जैन बगीचे स्थित उपाश्रय भवन में आज मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने परोपकार पर कहा कि जिसके अंदर परमार्थ आ जाए, त्याग का भाव आ जाए, वह परोपकारी है। जो भी व्यक्ति चारित्र लेना चाहता हो, उसका सहयोग करना परोपकार की पराकाष्ठा है। परोपकार से आत्मा की सुरक्षा और संरक्षा का मार्ग तैयार होता है।
सच्चा डॉक्टर रोगी के रोग को देखता है, व्यक्ति को नहीं। मुनिश्री ने कहा कि सम्यक धारणा यदि मन में बन गई तो फिर वह व्यक्ति परोपकार का कोई मौका नहीं छोड़ सकता। स्वयं के स्वार्थ को छोड़कर यदि कोई दूसरे का हित कर रहा हो तो वह परोपकार है। हमें स्वार्थ त्यागकर किसी की मदद करनी चाहिए ना कि स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी की मदद करनी चाहिए।
जैन मुनि ने कहा कि परमार्थ तत्वों को यदि गहराई से समझे तो कांसेप्ट क्लीयर हो जाएगा और आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़ पाएंगे। परोपकार महत्व और प्राथमिकता के बारे में बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि किसी अभावग्रस्त व्यक्ति को यदि हम कपड़े दे देते हैं तो वह कम परोपकार है, उससे बड़ा परोपकार भूखे को भोजन देना होता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति बिना कपड़े के रह सकता है लेकिन भूखा नहीं रह सकता। यदि व्यक्ति को कोई दूसरा व्यक्ति आत्म कल्याण के मार्ग पर ले जाता है तो यह सर्वोत्कृष्ट परोपकार है। उन्होंने कहा कि द्रव्य परोपकार – भाव परोपकार का कारण बनता है।
मुनि श्री वीरभद्र ने आगे फरमाया कि दूसरों को पीड़ा पहुंचाना, आगे चलकर स्वयं के लिए पीड़ा का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि इसलिए दूसरों को पीड़ा नहीं पहुंचाना चाहिए। पुण्योदय और पापोदय दोनों ही जबरदस्त है।
अपने जीवन में परोपकार के माध्यम से हम पुण्योदय की राह में बढ़ जाते हैं, जिससे कि हमारे आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि जीवन में धर्म की सुदृढ़ता के लिए परोपकार पहली सीढ़ी है जो हमें शिखर तक पहुंचाएगी।

