राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 27 जुलाई। प्रख्यात जैन संत एवं मुनि विनय कुशल जी के सुशिष्य मुनि वीरभद्र (विराग ) जी ने कहा कि हम झूठ बोल रहे हैं तो हम अपने आपको ही छल रहे हैं। झूठ बोलने वाला व्यक्ति हमेशा दुखी रहता है।
झूठ बोलते समय वह हमेशा टेंशन में रहता है और उसकी टेंशन का६ कारण यह होता है कि कहीं मेरा झूठ पकड़ा ना जाए,कहीं मेरी चोरी ना पकड़ी जाए। उन्होंने कहा कि समय आने से पहले अपने भाव को सुधार लेना चाहिए ताकि हमें दुख झेलना ना पड़े।
‘मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी आज जैन बगीचे के नए हाल में अपने नियमित प्रवचन में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि आत्मा ही स्वयं का मित्र है और आत्मा ही स्वयं का शत्रु भी है। झूठ के कारण पराधीनता स्वीकार करनी पड़ती है। मुनिश्री ने कहा कि सारे ग्रह का इलाज है किंतु परिग्रह नाम के ग्रह का कोई इलाज नहीं है। चित्त शांत रहेगा तो स्वयं पर प्रभाव पड़ेगा ही। संसार में सुखी रहना है तो कषायों को छोड़ना होगा। परिग्रह का त्याग कर साधना के मार्ग में आगे बढ़ना होगा।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि अपने पाप का परिणामों के साथ ही सामना करना पड़ेगा। दुखों का मूल कोई है तो वह है अहंकार। मान कषाय को त्यागना होगा। अपने सारे दुखों का कारण कहीं ना कहीं कंपैरिजन ( तुलना ) है। इसके अलावा दुख का एक कारण यह भी है कि हम अपने आपको कुछ ना कुछ मानते हैं जिसके कारण हमको दुख झेलना पड़ता है। यदि हम अपने आपको कुछ ना माने तो दुखी होने का सवाल ही उत्पन्न नहीं होगा।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि हम जब तक विद्यार्थी रहेंगे तब तक कुछ ना कुछ सीख पाएंगे, जिस दिन शिक्षक हो जाएंगे उस दिन से हमारी प्रगति रुक जाएगी। अपने जीवन में अहंकार को स्थान ना दे। अहंकार यदि मन में आ जाए तो महापुरुषों को याद करें। माया के जंगल से बचने का प्रयास करें। अपने आप को जितना ज्यादा सरल बना सके, बनाएं। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाज़रा ने दी।

