नगपुरा/ दुर्ग (अमर छत्तीसगढ़) 5 अगस्त। पाप करने के लिए प्रयत्न जरूरी नहीं है लेकिन पाप धोने के लिए प्रयत्न करना जरूरी है ।
विश्व में जितने भी धर्म है, हिन्दू, सिक्ख – बौद्ध, ईसाई, सभी धर्म की एक ही परिभाषा है- दुर्गति में गिरते हुए जीव को थाम लें, धारण कर ले, वह धर्म है।
नाम भले ही अलग-अलग है. लेकिन मूल में जीव को सद्गति की ओर ले जाने वाला पथ ही धर्म है। भगवान श्री महावीर स्वामी ने फरमाया कि मोक्ष के अभिलाषी जीव को पापों से बचना चाहिए। पाप से मुक्त बनने का प्रयास करना चाहिए।
जो जीव पाप के परिणाम को जानता है, समझता है, वह पाप करने से डरता है, अर्थात पाप कार्य से दूर हट जाता है।” उक्त उद्गार साध्वी श्री लब्धियशाश्रीजी म.सा. ने श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ चातुर्मास प्रवचन में व्यक्त किए।

प्रवचन श्रृंखला में आराधकों को संबोधित करते हुए साध्वी श्री लक्ष्ययशा श्री जी मसा ने कहा कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए सात सोपान है।
समय का सदुपयोग, सकारात्मक सोच, सदैव हंसते रहना, दूसरों की सही प्रशंसा करना ( प्रोत्साहन देना), दूसरों की बाते ध्यान से सुनना (विनम्रता से सुनना), बिना शर्त के प्रेम करना और दूसरे को बिना शर्त के भूलों के लिए क्षमा करना ।
आत्मा ही आत्मा का मित्र है, शरीर धर्म आराधना का साधन है। कायिक शक्ति के बदौलत धर्म हम क्रियाएं कर सकते हैं। जीवन में धर्म की परिणति के लिए सतत् जागृति की आवश्यकता है ।
जागृत रहने का नाम जीवन है ,सोये रहना मृत्यु है । जीवन कितनी लम्बी है यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि जीवन कैसा है यह महत्वपूर्ण है। अच्छे विचार ही अच्छे व्यवहार की जननी है जीवन है।

मनुष्य जीवन एक ऐसा सशक्त साधन है जिसमें जीव अपने यथार्थ स्वरूप को पहचानने की प्रचंड शक्ति रखता है। सही दिशा में पुरुषार्थ जरूरी है।
श्रावण सुदी 12 को प्रवर्तिनी वंदना
तीर्थ के परोपकारी, तीर्थोद्धार जीर्णोद्धार यात्रा के प्रेरक सम्बल, अनेकों तीर्थों के सृजन में, अनेको भक्तों के जीवन को धर्म से ओतप्रोत करने वाली महान शासन सेविका प्रवर्तिनी साध्वी रत्ना श्री वाचंयमा श्री जी (पूज्य बेन )म. सा . के 88 वें जन्म दिवस पर “शासनरत्ना- प्रवर्तिनी वंदना” कार्यक्रम 6 अगस्त को सुबह आयोजित है!


