राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 11 अगस्त। श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि अक्सर लड़ाइयां मान कषाय की वजह से होती है। घरेलू झगड़े भी इसी वजह से होते हैं। एक व्यक्ति यदि मौन धारण कर ले तो यह झगड़ा होगा ही नहीं। एक-दूसरे का मान-सम्मान करें तो किंतु-परंतु की स्थिति कभी नहीं आएगी।
जैन बगीचे के नए हाल में आज अपने नियमित प्रवचन में जैन संत श्री वीरभद्र (विराग )जी ने कहा कि धर्म क्षेत्र में मान कषाय का कोई महत्व नहीं है, जहां तत्व समझ में आ जाए तो कोई चीज मुश्किल नहीं होती। शरीर के नुकसान से यदि आत्मा का परमानेंट सॉल्यूशन निकल जाता है तो फिर कोई बात नहीं। भूमि श्री ने कहा कि आगे बढ़ना है तो परीक्षा देनी ही होगी। परिणाम अपने आप नहीं आते, उसे बुलाना पड़ता है। कषायों से आलिप्त व्यक्ति को कोई ध्यान नहीं रहता कि वह किसको क्या कह रहा है। दरअसल क्रोध के आवेश में आकर व्यक्ति स्वयं को ही भूल जाता है, वह स्वयं को नहीं पहचान पाता और कुछ भी कह जाता है।
मुनि श्री ने कहा कि पहले हम बैठकर भोजन करते थे किंतु अब लाइन लगकर स्वान की तरह भोजन पर झपटते हैं। पहले जैसी आत्मीयता अब नहीं रही। बैठकर भोजन करने की परंपरा अब खत्म हो चुकी है। उन्होंने कहा कि क्रियाएं तो सभी को करनी पड़ रही है किंतु उसमें परमात्मा की आज्ञा शामिल नहीं होने की वजह से लोग दिग्भ्रमित हो रहे हैं।आज्ञा बिना धर्म का कोई वैल्यूएशन नहीं होता। मनमर्जी के अनुष्ठान से आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने आगे फरमाया कि अपने को गुस्सा क्यों आता है? उन्होंने कहा कि इसके पीछे का कारण यह है कि जीव अपने भीतर के रोग को तो निकालना चाहता है किंतु दोष को नहीं निकालना चाहता, अपने भीतर के अवगुणों को बाहर नहीं करना चाहता। उन्होंने कहा कि अपने भीतर की कमियों और कुसंस्कार को बाहर निकालकर आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़िये। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

