आचरण विमुख ज्ञान मूल्यहीन है- साध्वी श्री लक्ष्ययशा श्री

आचरण विमुख ज्ञान मूल्यहीन है- साध्वी श्री लक्ष्ययशा श्री

नगपुरा/ दुर्ग (अमर छत्तीसगढ) 11 अगस्त। ज्ञान और आचरण एक दूसरे से जुड़े हुए है। ज्ञान वह है, जो हम सीखते हैं, पढ़कर अर्जित करते हैं। आचरण वह है जो हम करते है। ज्ञान का आचरण में लाना ही सही मायने में ज्ञान का सदुपयोग है। ज्ञान हमें सही और गलत का भेद बताता है जिससे हम सही आचरण कर पाते हैं।

उक्त उद्‌गार श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा में चातुर्मास प्रवचनमाला में साध्वी श्री लक्ष्ययशा श्री जी म.सा. ने व्यक्त किए।
आराधकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जब हम ज्ञान को अपने जीवन में उतारते हैं तो वह हमारे आचरण में भी झलकता है। आचरण विमुक्त ज्ञान मूल्यहीन है।

ज्ञान हमें सही दिशा दिखाता है और आचरण हमें उस दिशा में ले जाता है। ज्ञान को व्यवहार लाने पर ही श्रेष्ठ आचरण का सृजन होता है। ज्ञान प्राप्त करना सरल हैं, लेकिन उसे आचरण में लाना कठिन कार्य है। जिस ज्ञान से चित्त की शुद्धि होती है, वही यथार्थ ज्ञान है। मनुष्य ज्ञान से पदार्थों को जानता है ,दर्शन से उन पर श्रद्धा करता है।

चारित्र से कर्मों के आगमन को रोकता है और तप से आत्मा को शुद्ध करता है। ज्ञान और क्रिया के संयोग से ही फल की प्राप्ति होती है। व्यक्ति अपने जीवन में सद्‌गुणों का, सद्‌भावों का संग्रह कर, स्वयं के दोषों में सुधार कर, दुर्विचारो को दूर कर, दुर्भावनाओं को दूर कर – सद्‌गुरु के योग से परमात्मा से संबंध स्थापित कर सकता है।


प्रवचनमाला में श्री आचारांग सूत्र पर व्याख्या करते साध्वी श्री आज्ञायशा श्री जी म.सा. ने बतलाया कि श्रमण भगवान श्री महावीर स्वामी ने जीवों को उपदेशित करते हुए फ़रमाया कि अज्ञान और मोह ही इस संसार में अहित और दुःख का कारण है। जहां परमात्मा के वचन के प्रति विरुद्धता नहीं है , मैत्री की भाव है वहां धर्म है।कथानक संदर्भ में आचार्य श्री हरिभद्र सूरीजी के जीवन घटनाओं का विस्तृत विवेचना किए।

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