सूत्र वांचन : श्री जैन जवाहर मंडल प्रागंण में दिपक शोभन मुनिजी ने किया सूत्र वाचन

सूत्र वांचन : श्री जैन जवाहर मंडल प्रागंण में दिपक शोभन मुनिजी ने किया सूत्र वाचन

देशनोक (अमर छत्तीसगढ़) 21 अगस्त । प्रवचनराम जन्मभूमि देशनोक में श्री जैन जवाहर मंडल प्रागंण में शासन दिपक शोभन मुनिजी म.सा. ने अन्तगडदसाओं, सूत्र का वांचन किया।

धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा है भव्य उपासकों इस शास्त्र में परमात्मा महावीर ने धर्म देशना अर्थ रूप में प्रवाहित की। इस शास्त्र में eo भव्य आत्माओं के बारे में जानकी दी है। में eo महान आत्मा इस संसार से कैसे मुक्ति प्राप्त की है, जिसे कुल आठवर्ग है। आज प्रथम वर्ग पर धर्म सभा में प्रकाश डाला।

आचार्य सुधर्मा स्वामी के अन्तेवासी शिष्य जम्मू स्वामी ने विनम्र पूर्वक पूछा परमात्मा महावीर सिद्ध गति प्राप्त कर चुके है। इस सूत्र में क्या-क्या अर्थ फरमाया है, मुझे जानकारी दें। उस काल समय में (वर्तमान अपसर्पिणी) काल के चौथे आरे में, चम्पा नामक नगरी थी। उस नगरी में कोणिक राजा राज करते थे।

उस क्षेत्र में आचार्य सुधर्मा स्वामी अपने पांच सौ शिष्यों के साथ ग्राम से ग्राम विचरण करते हुए चम्पा नगरी में पधारे, वहां के जनसमुदाय को उन्होंने धर्मोपदेश दिया। अपने शिष्य जम्बूस्वामी को बताया भगवान महावीर ने इस सूत्र के प्रथम वर्ग के दस अध्ययन फरमाए है।

  1. गौतम
  2. समुद्र
  3. सागर
  4. गंभीर
  5. स्तिमित
  6. अचल
  7. काम्पिल्य
  8. अक्षोम
  9. प्रसेनाजित
  10. विष्णु

उस काल उस समय द्वारिका नामक नगरी थी। उस नगरी में कृष्ण नामक वासुदेव राजा राज करते थे। उस नगरी में अंधकवृष्णि राजा निवास करते थे, उसकी धारणी नामक महारानी थी। उस काल उस समय में धर्म की आदि करने वाले तीर्थकर भगवान अरिष्ट ने भी संयम तप से आत्मा को भावित करते हुए विचरण कर रहे थे। वहां चारों जाति के देवों का आगमन हुआ। कृष्ण वासुदेव भी उनके दर्शन करने हेतु निकले। गौतम कुमार भी प्रभु के दर्शन करने निकले।

वे भगवान के उपदेश सुनकर प्रसन्न हुए और निवेदन किया माता-पिता की अनुमति लेकर आता हूं, वे अनुमति लेकर आगार धर्म (गृहस्थ धर्म) को छोड़कर अनगार धर्म को स्वीकार कर लिया।

दीक्षा अंगीकार की एवं निग्रन्थ प्रवचन को सन्मुख रखते हुए संयम की साधना पूर्वक विचरण करने लगे। परमात्मा के पास उपवास भेल, तेला, मासखम्मण आदि तप से आत्मा को भावित किया। भगवान से अनुमति लेकर एक

माहक भिक्षु प्रतिमा को स्वीकार कर वहां अराधना की और गुणरत्न संवसर तप भी किया। प्रभु से संथारा की अनुमति लेकर गौतम अनगार सिद्ध गति को प्राप्त कर लेते है। इसी प्रकार नौ पुत्र भी सिद्ध गति प्राप्ति कर लेते है। शेष जारी है।

अशोक सुराणा ने जानकारी देते हुए बताया राम जन्म भूमि में अनुपम अठाई तप अनुष्ठान प्रत्यखान देशनोक की पुण्य धरा पर गुरुदेव के मुखार से करीब 575 की अठाई के पच्चखान हो गए है और केशलोचन 140 के करीब हुए है।

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