सिद्धचक्र महामंडल विधान में कुल 2040 अर्घ्य मंडप पर समर्पित किए जाएंगे…. शुद्ध भाव से अनुष्ठान करने से हमारे जीवन एवं घर गृहस्थी के समस्त पाप-ताप और संताप नष्ट हो जाते – विधानाचार्य मनोज भैया

सिद्धचक्र महामंडल विधान में कुल 2040 अर्घ्य मंडप पर समर्पित किए जाएंगे…. शुद्ध भाव से अनुष्ठान करने से हमारे जीवन एवं घर गृहस्थी के समस्त पाप-ताप और संताप नष्ट हो जाते – विधानाचार्य मनोज भैया

बिलासपुर(अमर छत्तीसगढ) 30 अक्टूबर। जैन धर्म में अष्टान्हिका महापर्व का बहुत महत्व है, कार्तिक मास के अष्टान्हिका महापर्व में श्रीमंत सेठ प्रवीण शकुन जैन, प्रशांत जिमी जैन एवं समस्त कोयला परिवार बिलासपुर द्वारा श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर क्रांति नगर में श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान प्रारंभ हुआ।

विश्व शान्ति की मंगल कामना से प्रारम्भ हुए इस अनुष्ठान को संपन्न कराने हेतु ललितपुर से बाल ब्रम्हचारी मनोज भैया उपस्थित है, जिनके ओजस्वी वाणी और शुद्ध उच्चारण के द्वारा सिद्धचक्र महामंडल विधान संपन्न कराया जा रहा है।

टीकमगढ़ के राकेश म्यूजिकल ग्रुप के साथ विधानाचार्य बाल ब्रह्मचारी मनोज भैया के मुखाग्र बिंदु से प्रातः 6:30 बजे अभिषेक शांतिधारा प्रारम्भ हुई।

आज शांतिधारा करने का सौभाग्य श्रीमंत सेठ प्रवीण जैन, प्रशांत जैन, सुरेश जैन, मिठ्ठन लाल, पी.सी. जैन, अरविन्द जैन, सुन्दर लाल आदि को प्राप्त हुआ। अभिषेक शांतिधारा पूर्ण होने के उपरान्त पहले दिन के अर्घ चढ़ाये गए।

विधान के दौरान विधानाचार्य जी ने श्री सिद्धचक्र महामण्डल विधान की महिमा और उपयोगिता को सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने बताया कि जैन परंपरा में श्री सिद्धचक्र महामण्डल विधान की विशेष महिमा है, ऐसा कहा जाता है कि सिद्धचक्र महामण्डल विधान में समस्त पूजाएं समाहित हो जाती हैं।

सिद्ध का अर्थ है जो समस्त कलंक से मुक्त देहातीत परमात्मा हैं ; चक्र का अर्थ है समूह और मंडल का आशय एक प्रकार के वृताकार यंत्र से है, जिसमें अनेक प्रकार के मंत्र व बीजाक्षरों की स्थापना की जाती है।

विधान शब्द का अर्थ है – साधन या अनुष्ठान। यहां विधान का अर्थ एक ऐसे अनुष्ठान से है, जो हमारे इष्ट लक्ष्य की पूर्ति का साधन है। इस प्रकार सिद्धचक्र महामण्डल विधान का अर्थ होगा – विशिष्ट विधि-विधान से मन्त्र आराधना के साथ मण्डल की रचनापूर्वक सिद्ध परमात्मा समूह की आराधना। इसमें मन्त्र- तंत्र- यन्त्र तीनों का समावेश है। सिद्धचक्र मण्डल की स्थापना यन्त्र है।

मन्त्राराधना इसमें समाहित है ही तथा आठ-सोलह आदि द्विगुणित रूप से की जाने वाली पूजा एक प्रकार की तांत्रिक प्रक्रिया है। अष्ट द्रव्यों के माध्यम से अपनी भक्ति को प्रकाशित करना पूजा कहलाती है। पूजा के साथ जाप आदि विहित-विधि अनुसार किया जाने वाला अनुष्ठान विधान कहलाता है।

मण्डल की संरचनापूर्वक होने वाला विधान मंडलविधान कहलाता है। श्री सिद्धचक्र महामण्डल विधान में मण्डल का अपना महत्व है। दिव्य शक्तियों के आह्वान के लिए तैयार किया गया रेखाचित्र मण्डल कहलाता है, जो कि विशिष्ट शक्ति का पुञ्ज होता है।

जब हम एक मण्डल की संरचना करते हुए उसमें बीजाक्षर स्थापित करते हैं तो उसका एक एकाकी प्रभाव होता है और जब अनेक मण्डलों की रचना की जाती है तो उसका प्रभाव भी संख्या के अनुपात में अनेक गुना हो जाता है।

बहुमण्डलीय श्री सिद्धचक्र विधान में बैठने वाले सभी श्रावक जब समवेत स्वर में मंत्र आदि का उच्चारण करते हैं तो वहाँ विशिष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। एक मण्डल की रचनापूर्वक विधान करने से एक ही स्थान पर शक्ति संधारण होता है और अनेक मण्डलों की रचना करके विधान करने से कई गुना शक्ति-प्रवाह होता है; जो पूजा-विधान करने वाले श्रावकों के तन-मन और जीवन पर सकरात्मक प्रभाव डालता है।

बहुमण्डलीय विधान में प्रत्येक मण्डल पर बैठने वाले प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत विधान संपन्न होता है और सामूहिक रूप से उत्पन्न ऊर्जा का सकरात्मक प्रभाव भी वह प्राप्त कर लेता है। सिद्धचक्र महामंडल विधान में सिद्ध भगवान की आराधना की जाती है।

प्रथम दिन 8 अर्घ्य समर्पित किए जाते हैं और भगवान के 8 गुणों का व्याख्यान किया जाता है। इस प्रकार से द्विगुणित क्रम में आठ, सोलह, बत्तीस, चौंसठ, एक सौ अट्ठाइस, दो सौ छप्पन, पांच सौ बारह और अंतिम दिन एक हजार चौबीस अर्घ्य समर्पित किए जाते हैं।

सिद्धचक्र महामंडल विधान में कुल 2040 अर्घ्य मंडप पर समर्पित किए जाते हैं। इस प्रकार बहुमण्डलीय श्री सिद्धचक्र विधान की यह परंपरा श्रावकों के लिए बहुविधहिताय और कल्याणार्थ है। अतः शुद्ध भाव से यह अनुष्ठान करने से हमारे जीवन एवं घर गृहस्थी के समस्त पाप-ताप और संताप नष्ट हो जाते हैं।

यही कारण है कि आज प्रत्येक श्रावक अपने जीवन भर में हुए ज्ञात-अज्ञात पापों के प्रायश्चित के लिए कम से कम एक बार सिद्धचक्र महामंडल विधान अवश्य करना चाहता है । इसे सर्वसिद्धिदायी और मंगलकारी विधान के रूप में जाना जाता है।

सकल जैन समाज बिलासपुर सायंकालीन आरती में उपस्थित रहा और सभी ने पूरे भक्तिभाव के साथ आरती की। तदोपरांत ब्रह्मचारी भैया जी ने शास्त्र का वाचन किया। सांध्यकालीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में आज सन्मति विहार त्रिशला महिला मंडल के तत्वावधान में डॉ. कमोद जैन द्वारा लिखित एवं निर्देशित नाटिका राग और विराग का सफल एवं मर्मस्पर्शी मंचन किया गया।

इस नाटिका के माध्यम से यह बताया गया कि जहां एक ओर पूरा संसार मोह माया के जंजाल में फंसा हुआ है। क्रोध, मान, माया, लोभ जैसी कषायों से बच पाना मुश्किल ही नहीं असंभव सा लगता है और यह सभी बंधन हमें इस संसार में ही रोक देते हैं। यह सब झूठ होते हुए भी हमें सच लगने लगता है और हम सभी इसी को अपनी दुनिया मानते हैं। यहां तक कि कभी-कभी साधु भी इन चक्करों से दूर नहीं हो पाते।

ऐसे में परम वीतरागी, परम ज्ञानी और इस पंचम काल में भी चतुर्थकालीन चर्या का पालन करने वाले आचार्य विद्यासागर जी महामुनिराज की जीवन की झांकी प्रस्तुत करती यह नाटिका सभी को भाव विभोर कर गई। इस नाटिका में माया की भूमिका डॉ. कमोद जैन, कषायों की भूमिका विदित, रम्यक, हर्ष एवं स्वस्ति ने निभाई।

विद्याधर के माता-पिता की भूमिका मालती जैन एवं हेमंत जैन ने निभाई। आहारदाता की भूमिका सोना जैन, देविष्ठा जैन, ब्रह्मचारिणी दीदी, सोनल जैन ने अदा की, वहीं विद्याधर के मित्र का किरदार प्रभात, मयंक, ओजस्विनी और वीर ने तथा विद्याधर की भूमिका में अव्यान एवं अर्थ रहे। मोक्ष लक्ष्मी की भूमिका मीनल जैन ने निभाई।

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