खुमान साव की पुण्यतिथि पर विशेष…. अब मोला जान दे संगवारी!

खुमान साव की पुण्यतिथि पर विशेष…. अब मोला जान दे संगवारी!


(रोशन साहू ‘मोखला) राजनांदगांव (अमर छत्तीसगढ़) 8 जुन।

संस्कार धानी राजनांदगांव से 35 किलोमीटर दूर ग्राम खुर्सीटिकुल की माटी ने 97 वर्ष पूर्व 5 सितम्बर 1929 को एक ऐसे होनहार हीरे को सौंपा। जिसने छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत की दुनिया को ऐसी ऊंचाई दी कि उनका हर सर्जन लोकगीत का मानदण्ड बन गया। उनका कृतित्व व व्यक्तित्व का समन्वित स्वरूप के आलोक से छत्तीसगढ़ महतारी की महिमा सम्पूर्ण भारत वर्ष के साथ ही विश्व के कई देशों में प्रकाशमान हो रहा । 
    खुमान साव इसलिए भी याद किए जाएंगे  कि उन्होंने छत्तीसगढ़ के अनगढ़ कलाकारों की प्रतिभा को तराश निखार कर सदैव अपने मंच में स्थान दिया ।

 छत्तीसगढ़ के ज्यादातर लोक कलाकार जैसे-पंचराम देवदास, महेश ठाकुर ,मदन शर्मा , रमेश ठाकुर, संतोष टांक,गोविन्द साव, राकेश साहू,,भैया लाल हेडाऊ, दुष्यंत हरमुख,भूषण नेताम,केदार यादव ,प्रकाश देवांगन,कविता वासनिक, लक्ष्मण मस्तुरिहा, महादेव हिरवानी , लता खापर्डे, माया खापर्डे, मोती राम साहू, भागवत सिन्हा, विष्णु साहू,गोपी पटेल,ओमप्रकाश साहू,उग्रसेन देवदास, कमल पाटिल, सुभाष रामटेके, ढालसिंह साहू,दिलीप साहू आदि-आदि कलाकार चंदैनी-गोंदा के व्यापक आलोक में दैदीप्यमान हुए। 

 छत्तीसगढ़ के ज्यादातर लोक कलाकार चंदैनी-गोंदा के बुनियाद से सज संवर और निखर कर आज अन्य मंचों में प्रस्तुति देकर लोगों की वाहवाही और तालियाँ बटोर असीम आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। 


     लोक-गीत की बारीकियां,नज़ाकत,गीत का मूड,आरोह-अवरोह ही नही अपितु उसके अनुरूप भाव नृत्य, वेशभूषा व परिकल्पना की समझ कोई इनसे सीखे। बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कई गीतों के गीतकार भी रहे हैं।जिनके लिखे गीत बेहद प्रभावोत्पादक हैं।
 किसी भी समाज की उन्नति वहां के लोक संस्कृति लोक साहित्य पर निर्भर करता है । लोक संस्कृति जहां व्यक्ति और समाज को माटी से जोड़ती है वहीं लोक साहित्य माटी के प्रति सम्मान का भाव अभिव्यक्त करती है ।छत्तीसगढ़ इस मामले में श्रेष्ठतर है क्योंकि यहां की कृषि,ऋषि व जनजातीय संस्कृति को लोक मानस ने अपने अंतर्मन में संजोए रखा है । ये वही लोग हैं जो सचमुच "सबले बढ़िया छत्तीसगढ़िया" हैं जो अपनी भाषा बोली पर गर्व करते हैं। गोद भराई,जन्म,विवाह से लेकर उहलोक गमन तक की विभिन्न संस्कारों के अनुरूप जीवन जीते हैं। सांस्कृतिक विरासत को आने वाली संतति तक पहुँचाने की कवायद को अपने जीवन उद्देश्य मानते हैं। और इससे बड़ी बात यह है कि यह वर्ग अपने मूल पहचान को बनाए रखने के लिए सजग हैं। इन सबके लिए छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति विशेषकर लोकगीत लोक संगीत का बहुत बड़ा योगदान रहा है।  
    गिने-चुने लोग होते हैं जिन्हें बाल्यकाल से ही अपना जीवन लक्ष्य मालूम रहता है वे निरन्तर उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तमाम बाधाओं को पार कर बिना थके,बिना रुके और बिना झुके सतत चलते ही रहते हैं। जो अपने मूल संस्कृति की पहचान के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। ऐसे व्यक्तित्व किसी भी परिस्थितियों से समझौता नहीं करते। ऐसे ही एक स्व नाम धन्य कलाकार खुमान साव जिन्हें लोग लोक कला का पुरोधा,लोक संगीत का भीष्म पितामह आदि नाम देते हैं।उनका पालन-पोषण मालगुजारी रियासत और उसके संपन्नता के छांह तले हुआ । लेकिन यह भी कहा जाता है कि सरस्वती और लक्ष्मी दोनों साथ-साथ नहीं रहा करती। विशेष कर लोक-कलाकारों के संदर्भ में यह बात सटीक बैठता है। कलाकारों की व्यथा देख किसी ने सच ही कहा है कि -भगवान को कलाकारों का पेट ही नही बनाना था । जीवन यापन के लिए अर्थोपार्जन जरूरी है।"गर मा डारे हार फूल ले पेट नई भरय" पीड़ा की गहराई बयां करती है।
  खुमान साव जी की रुचि बाल्य काल से ही संगीत के प्रति रही। पूत के पाँव पालने में ही नजर आ जाते हैं। उन्होंने महज 8 - 9 वर्ष की उम्र में हारमोनियम वादन प्रारंभ किया तथा 11 वर्ष की आयु में तो नाचा दल में संगत कर चुके थे। युवावस्था में वे अपनी सायकिल बेचकर  मायानगरी मुंबई भी गए जहां एक फीचर फिल्म के लिए उन्हें अभिनेता के तौर पर चुन लिया गया था। पर उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया  बाद में उक्त मूवी में विश्वजीत ने नायक की भूमिका निभाई थी। साव जी अपने आप को मूलतः संगीतकार ही मानते थे,हृदय में तो सात सुर हिलोरें मार रही थी मन मस्तिष्क में संगीत रचा बसा हुआ था,हाथों की अंगुलियों को हारमोनियम का रीड भा गई थीं, फिर कहीं और चैन कहां? वे वापस लौट आए अपने गांव और लग गए संगीत साधना में । रात को जब कभी निद्रा टूटती हारमोनियम बजाने बैठ जाते चूंकि उनका घर पान चौक में हवेली नुमा बड़ा सा था तो अन्य लोगों की नींद में खलल न पड़ता।
  खेत खलिहानों में काम कर रहे लोगों को जब भी फिल्मी गीत गाते गुनगुनाते  देखते सुनते तो मन मे दृढ संकल्प समाता कि मुझे ऐसे माधुर्यमयी संगीत सर्जना करनी है कि जन-जन के कंठों में माटी के गीत गान हो। वे लोक गीतों को फ़िल्म संगीत के समकक्ष ही नही उससे भी उच्च स्तर तक ले जाना चाहते थे। अतः छत्तीसगढ़ की माटी को 'महमहाने' के लिए पूरी शिद्दत से लग गए।        
  रामचंद्र देशमुख निर्देशित चंदैनी गोंदा में वे बतौर संगीत निर्देशक के रूप में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। तदनन्तर जब उक्त लोक मंच का बागडोर उनके हाथों आया तो आकाश में चंदैनी छिटकती गई चंदैनी गोंदा बगरने लगा।’ धरती के अंगना में चंदैनी गोंदा पुष्पित हुआ "तोर धरती तोर माटी " लोक कंठ का निनाद बन गया। हम तोरे संगवारी कबीरा हो’ की गान में जैसे कला संस्कृति की रक्षा का आव्हान हों। 

संगी के मया जुलुम होगे रे,कइसे दिखत हे आज उदास रे पतरेंगी मोर मैना, कबीरा तोर दुनिया बोहागे धारे- धार, “मुनगा के फुलगी” मे चहचहाती चिड़िया बिहान होने का सन्देशा देने लगीं, अब मोला जान दे संगवारी, पता ले जा रे पता दे जा रे गाड़ीवाला ज्यों सारे देश मे छत्तीसगढ़ का पता दे रही थी। चंदैनी गोंदा की कोठी में इतने सारे सुमधुर गीत कि उनकी सारी प्रस्तुतिकरण के लिए लगातार एक सप्ताह का समय भी कम पड़ जाऐं। खुमान संगीत ‘मन रंजन’ से उपर उठ ‘मन अंजन’ करने लगे। आकाशवाणी व कैसेट्स के माध्यम से लोक गीत व लोक भजन गांव गली चौपालों शहर नगर सर्वत्र सुनाई पड़ता। ‘खेत-खार’ में खुमान संगीत की फुरूर- फुरुर पुरवाही बहने लगीं। लगने लगा जैसे खेत के मेड़ में चोंगी पीते सुस्ताते कर्मवीरों को उनका संगी-संगवारी मिल गया हो, तो निराई- गुड़ाई करती माताएं बहिनें लोक संगीत की छाँह तले थकने का नाम न लेती हों ।
वर्तमान काल मे बिताया व जीया गया हर एक पल नया इतिहास गढ़ती है। हीरा को राख के ढेर में भी रख दिया जाए,चमक फीकी नही पड़ती। जीवन मे कितना भी झंझावत हो प्रतिभा अवसर का मोहताज नही होती अपितु अवसर देने का माध्यम बन जाया करती हैं। उन्होंने अपने अंतिम समय तक दबे छुपे प्रतिभाओं को नया छितिज दिया। ऐसे प्रतिभाएं आज भी उन्हें सदैव नमन करते हैं। कोई भी कलाकार छोटा या बड़ा नही होता अपितु कृति बड़ी होती है । बगरे हुए लोकगीतों को संग्रह कर उन्हें तराशने का श्रेय भी उन्हें जाता है।
जनमानस में छुपे हुए अनगढ़ अपरिमार्जित लोक- भजन,लोक- गीतों को माधुर्यमयी रूप देकर जन-जन का निनाद बनाने के लिए वे सदैव प्रयत्नशील रहे।साथ ही कलाकारों को तराश कर उन्हें स्थापित करने में भी वे सदैव लगे रहे ।
आज जबकि कोई भी मंच हो सर्वप्रथम कलाकारों के परिचय के बाद ही ज्यादातर प्रस्तुतियाँ होती है। इसके विपरीत उन्होंने इस परिपाटी को अपने मंच में कभी नही अपनाया ।”आपका हुनर ही आपका मूक परिचय है जो कभी न कभी मुखर हो ही जायेगा।” वे समय के इतने पाबन्द थे की कोई भी कलाकार मंचीय प्रस्तुति में पल भर भी देर कर दे ? चाहे कितना भी नामी गिरामी कलाकार क्यों न हो उसकी खैर नही,वे भरे मंच में ही प्रस्तुतिकरण के बीच में ही कनखियों से देखते कि कोई भी आर्टिस्ट सकपकाए बिन नही रह पाता था ? कभी ऐसी स्थिति निर्मित हो गई तो झिड़क भी देते। मुझे स्मरण है जब सोमनी में आज से तकरीबन 30 बरस पूर्व गुरुघासीदास जयन्ती के अवसर पर सर्द कंपकपाती रात प्रहसन में भाग ले रहे ख्यातिनाम हस्ती को स्वेटर निकाल कर मंच पर आते पल भर की देर न हुई कि “तमाशा कर रहे हो “कह झिड़क दिया था। दर्शक दीर्घा भी उनके सख्त मिजाज व अनुशासन प्रियता से हतप्रभ रह गया था।” एक तरह से यह झिड़की दर्शक दीर्घा के लिए भी प्रतीत हुआ कि-” यदि लोक संस्कृति का दिग्दर्शन करना हो तो पूरी तल्लीनता और बिना किसी शोर शराबे के अप्रतिम प्रयासों को निहारना होगा।”
जिस समय साव जी संगीत साधना में रत थे उस समयकाल में पेशे से शिक्षक रहे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं कही जा सकती थी कि वे पूरे परिवार का भरण -पोषण कर पाते जबकि उनके परिवार का एक हिस्सा लोक कलाकार लोग भी रहे हों आए दिन रिहर्सल,लोक मंच लोक संगीत लोक साहित्य से जुड़े लोगों का नित आवागमन आवभगत चाय पानी भोजन व यथासंभव आने-जाने का बस ट्रेन किराया देना जरा मुश्किल ही था पर साव जी भरसक प्रयास करते कि किसी को कोई कष्ट न हो। इस कारण परिवार को भी कई-कई बार अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए भी कष्ट सहना पड़ा। म्युनिसिपल स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम होता तो लोक संस्कृति लोक मंचीय आवश्यकता अनुरूप आभूषण और वस्त्र आदि के लिए किराया से व्यवस्था करना पड़ता यद्यपि इसके लिए शाला फंड से ही रूपए की व्यवस्था की जाती थी पर खुमान साव कुछ दूर की सोच कर उसमें स्वयं की राशि मिलाकर उन सामानों को पूरा दाम देकर खरीद लेते इससे आर्थिक भार आन पड़ता पर कुछ लोग परफेक्टनिश होते हैं,अपने कलाकारों को कोई तकलीफ ना हो और एक साथ सम्यक रूप से सभी नृत्य कलाकार पहन सके और लोगों में लोक संस्कृति की झांकी दिखाई जा सके आम लोगों में लोकगीत के प्रति रुझान पैदा हो।वे ऐसे खर्च से पीछे नही हटे। इस कारण परिवार को भी कई कई बार आर्थिक परेशानियां तंगहाली का सामना करना पड़ता था।
हास- परिहास के दरम्यान वे एक वाकिया का जिक्र करते कि अपने गृह ग्राम खुर्सीटिकुल में एक रेडियो खरीद करके लाए थे।सत्य है कि संगीत ईश्वर का वरदान है संगीत को एक व्यक्ति नहीं पचा सकता,बिन बांटे चैन नही मिल पाता । जैसे देव की कृपा को पचाया नहीं जा सकता। वैसे ही संगीत भी एक ऐसी विधा है जिसको अकेले हजम करना संभव नहीं, तो पास-पड़ोस के लोगों को रेडियो सुनाया करते थे। एक दिन उनके बड़े भाई ने कहा कि गांव में मुनादी (हांका) डलवा दो और लोगों को पान चौक बुला लो रेडियो सुनने के लिए। चौक में रेडियो सुनने के लिए रेडियो सेट लाया गया लोग भी एकत्रित हो गए लेकिन उसे दिन रेडियो चालू ही नहीं हुआ उस रेडियो को लेकर के शहर में सुधरवाने के लिए बैल-गाड़ी में बैठ कर लाया गया। रेडियो दुकान वाले को दिखलाया तो पता चला कि उसकी बैटरी थोड़ी तिरछी हो गई थी। और तब भी संयमित मुस्कराहट से बताते कि मात्र इस कारण रेडियो चालू नहीं हो पाया । इसके उपरांत गांव वालों को रेडियो सुनाया गया।
ऐसी प्रवृत्ति के विरले ही लोग होते हैं आज तो लोग अपने जीवन में किसी का दखल पसंद नहीं । सर्वत्र एकाकी जीवन दीख पड़ता है। पर जिनके हृदय में ही सात सुरों की धड़कन हो चाल में ताल हो वो बांटने में विश्वास करता है।
खुमान साव ऐसे व्यक्ति थे जो लोक संगीत को ऊंचाई देने के लिए हमेशा आगे रहे स्वर लहरियाँ उस समय और ज्यादा प्रभावशाली हो जाता है जब संगीत के साथ साहित्य भी घुल मिल जाए । इस मायने मे खुमान साव बहुत ऊंचे सिद्ध होते हैं क्योंकि अंचल के बड़े-बड़े साहित्यकार गीतकारों के गीत चंदैनी गोंदा में समाहित होते गए और उन गीतों ने मनोरंजन ही नहीं किया अपितु मनोअंजन किया। पवन दीवान,हरि ठाकुर,मुकुंद कौशल, लक्ष्मण मस्तुरिहा,रवि शंकर शुक्ला, बद्रीविशाल परमानंद, रामेश्वर वैष्णव,फूलचंद श्रीवास्तव , डॉ विनय पाठक, द्वारिका प्रसाद तिवारी “विप्र” , मदन शर्मा, हर्ष कुमार बिंदु,नारायण लाल परमार,भगवती लाल सेन,हेमनाथ यदु , चतुर्भुज देवांगन,राम कैलाश तिवारी,राजेंद्र ठाकुर,धरम लाल कश्यप,कोदूराम दलित , प्यारेलाल गुप्त,केदार दुबे जैसे सिद्धहस्त गीतकारों के गीतों ने जहां जन-जन के हृदय में पैठ बनाई तो वहीं खुमान संगीत की कल-कल छल-छल प्रवाहमान संगीत सरिता ने खेत के मेड़ों से लेकर मेहनतकश श्रमवीरों के मन मे उत्साह का संचार किया। व्यग्र मन को शांति सुकून दी तो वहीं युवा मन को फिल्मी गीतों की फूहड़ता व लोक गीत के स्वाभाविक सौंदर्य के बीच तुलनात्मक अंतर को समझ कर माटी के जुड़ाव की ओर उन्मुख किया। ‘चल शहर जातेन रे भाई गांव ल छोड़ के शहर जातेन की चकाचौंध प्रवृत्ति के विपरीत ” मोर गंवई गंगा ये ” का गान मात्र मनोरंजन नही था अपितु यह प्रकृति की ओर लौट चलने का पुनीत आग्रह था। होगे रे बिहान जागो जागे रे किसान चलो खेत जाबो रे, सावन मा लोर लोर भादो मा घटा घोर , चल चल ग किसान बोये ले चल धान असाढ़ आगे ना , मोर खेती खार रुनझुन मन भंवरा नाचे झूम झूम श्रम का संदेश देती। छत्तीसगढ़ी अस्मिता किसानों की दुर्दशा को ” मंय छत्तीसगढ़िया अंव रे” का स्वर आज भी उद्धेलित करता है जिसका भाव आज भी प्रासंगिक है।
चंदैनी गोंदा के नायक- नायिका शहर के चकाचौंध, विलासिता पूर्ण जीवन जीने के आदी नही हैं वे खेतों खलिहानों,अमराइयों, देश की रक्षा के लिए घर परिवार छोड़ गए वर्ग से आते हैं जिन्हें मालूम है “मंगनी मा मया नई मिले” । उनके मन मे “घानी मुंदी घोर दे पानी दमोर दे हमर भारत देस ला दही दूध मा बोर दे” की सर्व कल्याण की भावना समाई है।“कांटा खूंटी के बोवईया बने बने मा रेंगईया” माटी की समरसता उड़ेल देना चाह रहे तो सरहद में तैनात सैनिक को अपनी प्रेमिका याद आती है तो बरबस गुनगुना उठता है ’जुलुम होगे राम मोहनी नैना के मारे’ की परिकल्पना देखते ही बनती।

लहर मारे लहर बुंदिया, कइसे के मारे नैना बान, धनी बिन जग लागे सुन्ना रे नई भाये मोला, खनर-खनर पैरी बाजे छनर-छनर चूरी नाचत कुलकत मटकत रेंगय बेलबेलही टूरी, धन-धन रे मोर किसान के माध्यम से किसानों की अनवरत श्रम का मान करने के लिए बुद्धिजीवियों व श्रमजीवियों के बीच की खाई को पाटने का संदेश देती, पता ले जा देजा गाड़ीवाला, आधा रात पहागे मोला घर मा दिही गारी ओ रामा अब मोला जान दे संगवारी, तोर कारन बइहा बनेंव तोर कारन छोड़ के पतरेंगी मोला जाबे कहां बइहा बनेंव तोर कारन, मन डोलय रे माघ फगुनवा, तोर सुरता म ये मन भंवरा गुनगुनावत रहिथे , ये कईसन दिनमान रे भइआ मोर कोलिहा पढ़े पुरान जैसे असंख्य गीतों में उनकी परिकल्पना दर्शनीय रही है।

नायक ‘दुखित’ और नायिका ‘मरही’ के घर में ‘सुमन’ का जन्म तो जैसे नयी पीढ़ी में नव आस संचरण होने का असीम निहितार्थ है। ऐसे अनेकानेक गीतों की मंचीय प्रस्तुति आज भी लोगों के जेहन में रचा बसा है कि अरसे बीतते जा रहे पर याद नही जाती।

उनके द्वारा सरगम से सजी कालजयी श्रवणीय संगीत से आज भी छत्तीसगढ़ का आकाश गुंजायमान हो रहा है।
गुणी जन व कला समीक्षक लोग भी गाहे-बगाहे यही कहते कि अगर जिन्हें छत्तीसगढ़ को जानना समझना हो इसकी सांस्कृतिक विरासत को समझना हो तो उन्हें चंदैनी-गोंदा देख लेना चाहिए जहां विभिन्न पर्वों की बारहमासी गीत,कर्मा ,ददरिया, सुआ,बांस गीत, बिहाव गीत,फुगड़ी,पंथी,देवार गीत,सोहर, फाग और न जाने क्या क्या …उनकी एक झांकी बस पर्याप्त है।
खुमान साव ने संगीत के साथ लोक साहित्य की महत्ता को भलीभांति समझते थे साहित्यधर्मियों से विचार विमर्श करते व मान देते। उनकी अभिरुचि साहित्य में भी गहरी तौर पर रही है। उन्होंने नवोदित साकेत साहित्य परिषद सुरगी को भी अपना स्नेहाशीष दिया ।

उन्हें जहां पर भी लोकगीत मिल जाता गीतों को सहेजने,परिष्कृत करने उन गीतों को परिमार्जित करने में सदैव कर्मवीर बन कर सदैव आगे रहे। तभी तो अंचल के छोटी-छोटी नाच मंडलियों लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों को वे दर्शक दीर्घा में बैठकर पूरी तल्लीनता के साथ देखा करते थे ।

यहां तक गांव-गांव घूमने वाले याचक जन या फिर घुमंतू प्रजाति के लोगों की प्रस्तुति को वह पूरे शिद्दत के साथ देखा करते थे। और उन्हें परिष्कृत व परिमार्जित कर अपने मंचों में सदैव स्थान दिया करते थे ।

साव जी आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी प्रस्तुति आज भी एक पैमाना है लोग उस पैमाने पर अन्य गीतों की परख करते हैं। लोकगीत के मूल स्वरूप को बनाए रखने के लिए अन्य इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्रों का सहारा नहीं लिया यदि लिया भी तो उन्हें उसे उस स्तर पर ही रखा कि मौलिकता बनी रह सके।


लोकगीत तब मरता है जब उसका व्यवसायीकरण कर फूहड़ता परोस दी जाए। इस बात के लिए वे हमेशा फिक्रमंद रहे वे अश्लीलता के सख्त खिलाफ रहे। इस प्रकार के लोगों को वे कभी कलाकार ही नही मानते थे। लोकगीत,लोक स्वर, लोक संगीत सदैव मूल स्वरूप में रहे इसके लिए वह अंतिम समय तक प्रयासरत रहे ।
मुझे याद आता है कि उनके बारे में लोक कलाकार लोग कहते भी हैं कि ऊपर से वह जितने सख्त थे अंदर से उतने ही नरम थे इस बात में तनिक भी संदेह नहीं कि उनका व्यक्तित्व रौबदार था वह कभी भी किसी भी बात से समझौता नहीं करते थे ।

उन्होंने राजनैतिक रैलियों या राजनेताओं के लिए भीड़ एकत्र करने के लिए कभी भी मंचन नही किया। कलाकार शारद पुत्र हैं उनकी गरिमा सदैव बनी रहनी चाहिए। कलाकारों को शासन का मुंह ताकना पड़े इस बात की पीड़ा से आहत रहे साथ ही वे किसी अलंकरण या सम्मान के लिए खुद होकर आगे नही आए।

जिस सम्मान को मांगना पड़े तो कैसा सम्मान?लोगों की तालियाँ व कार्यक्रम के दौरान शिष्ट व्यवहार उनके लिए सब कुछ था।यद्यपि उन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान से अलंकृत किया गया।लगता है जैसे यह अलंकरण लोक संगीत का अलंकरण है।


चंदैनी गोंदा की प्रस्तुति में लोग ऐसे खो जाते मानो जीवन धन्य हुआ, जिसे जहाँ बैठने की जगह मिली वहीं बैठे-बैठे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक संवाह की निर्मल प्रवाह से रात्रि कालीन बेला कब बीत जाती और कब भोर की लालिमा लिए “सुरुज नारायन ” स्वयं अभिनंदन करने को आतुर होते कि वे भी अपने दिन का प्रारम्भ “अरे हो तोर सुंदर काया हरि बिन तरसे हो ” के निर्गुनी भजन सुन कर स्वयं को धन्य कर सके।

ऐसा लगता मानो विधि अधीन पंच तत्व भी खुमान संगीत का रसास्वादन कर रहे हों प्रवाह मान संगीत सरिता छलकती जाती । रात भर चंदैनी- गोंदा के गीत संगीत और नृत्य जन समुदाय डूबते-उतरते रहते।

 आज छत्तीसगढ़ की लोकगीत लोक संगीत  यदि पैमाना है तो खुमान साव की संगीत की तपस्या का फल है। तभी तो कई- कई संगीतकार इस बात को कहते भी हैं कि छत्तीसगढ़ की लोकगीत लोक संगीत को ‘खुमान संगीत’क्यों ना कहा जाए? क्योंकि उन्होंने लोकगीत को जन-जन के हृदय में उतारने में हमेशा आगे रहे । 9 जून 2019 को साव जी सूक्ष्म जगत वासी हुए। आज खुमान साव हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका सर्जन उनकी कृति उन्हें अमर बना दी है। तभी तो पद्मश्री गोविंद राम निर्मलकर आडोटोरियम में साव जी के आदमकद प्रतिमा को हर आगुन्तक श्रद्धा से शीश नवाते समय उनकी सांगीतिक अमरता को आत्मा की गहराइयों से महसूस कर पाते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर नवोदित कलाकार हों या स्थापित,सभी लोग सांगतिक श्रद्धा के पुष्प अर्पित कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के संगीत जगत से जुड़े कलाकार ,गुनी जन व प्रदेश के जन- जन की ओर से सादर नमन...आप पुनः जन्म लेकर फिर से इस धरा को "ममहाये"।
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