बिलासपुर(अमर छत्तीसगढ़) 19 जुलाई । छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है, माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम-2007 के तहत गठित मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल को जरूरत पड़ने पर बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए उनके ही घर से बेटे या रिश्तेदार को बेदखल करने का अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि यह कानून सिर्फ भरण-पोषण दिलाने के लिए नहीं, बल्कि बुजुर्गों को सुरक्षित और सम्मान के साथ रहने का अधिकार दिलाने के लिए बनाया गया है। छत्तीसगढ़ रायगढ़ जिले के रामदयाल साहू को सिंगल बेंच ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने मेंटनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय प्राधिकरण के आदेश को सही ठहराया।
दरसअल, रायगढ़ जिले के ग्राम कंचनपुर, तहसील घरघोड़ा निवासी रामदयाल साहू ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने मेंटनेंस ट्रिब्यूनल के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी मां हेमकुंवर के नाम पर बने मकान का कब्जा वापस करने और घर खाली करने का आदेश दिया था।
राजस्व रिकार्ड के अनुसार हेमकुंवर के नाम खसरा नंबर 321/46, रकबा 299 वर्गमीटर की आबादी भूमि का पट्टा है। इसी जमीन पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उनके नाम से मकान बना है। जांच में इस बात की पुष्टि हुई, उस मकान पर रामदयाल साहू का कब्जा था।
जांच रिपोर्ट के आधार पर मेंटनेंस ट्रिब्यूनल ने 12 नवंबर 2021 को आदेश देकर बुजुर्ग मां हेमकुंवर को मकान का कब्जा वापस दिलाने का निर्देश दिया था। आदेश जारी होने पर याचिकाकर्ता ने दोबारा मेंटनेंस ट्रिब्यूनल में अपील पेश की। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने 15 मई 2024 को फिर आदेश जारी कर 2021 के आदेश को लागू करने और मकान का कब्जा हेमकुंवर को दिलाने का निर्देश दियर। इस फैसले के खिलाफ रामदयाल साहू ने अपीलीय प्राधिकरण में अपील पेश की।
7 अगस्त 2024 को अपीलीय प्राधिकरण ने ट्रिब्यूनल का आदेश बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। प्राधिकरण ने रामदयाल साहू और उसके दो भाइयों को, अपनी मां को 1,500-1,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया। प्राधिकारण के इस फैसले को चुनौती देते हुए रामदयाल साहू ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता ने बताया, संपत्ति पैतृक है और उसके बंटवारे तथा स्वामित्व को लेकर सिविल सूट पहले से लंबित है। इसलिए ट्रिब्यूनल को बेदखली का आदेश देने का अधिकार नहीं था।
याचिका की सुनवाई जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच में हुई। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, वरिष्ठ नागरिक कानून का उद्देश्य बुजुर्गों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन देना है। यदि बेटा या रिश्तेदार उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा बनते हैं, तो ट्रिब्यूनल उन्हें घर खाली करने का आदेश दे सकता है। कोर्ट ने कहा, ट्रिब्यूनल संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला नहीं करता।
वह केवल बुजुर्ग की सुरक्षा और रहने के अधिकार की रक्षा करता है। इसलिए सिविल कोर्ट में लंबित मुकदमे से ट्रिब्यूनल की कार्रवाई प्रभावित नहीं होती। कोर्ट ने कहा, संपत्ति के मालिकाना हक और हिस्सेदारी का अंतिम फैसला सिविल कोर्ट ही करेगा।

