राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 4 सितम्बर। ” हम रिश्ते तो बनाना चाहते हैं किंतु वह कैसे बना रहे, इस ऒर ध्यान नहीं देते। हमारा ध्यान हर समय इस ऒर रहता है कि रिश्ता टूटना नहीं चाहिए लेकिन इस रिश्ते को बनाए रखने के लिए हमारा क्या प्रयास होना चाहिए, इस ऒर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। जो रिश्ता बना है उसे प्रगाढ़ करने का हमारा प्रयास रहना चाहिए।
” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने आज जैन बगीचा स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में अपने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान व्यक्त किए।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य जन्म लिए हैं तो गलतियां तो होगी ही, किंतु इन गलतियों को सुधार कर हमें आगे बढ़ना होगा। स्वयं के भीतर सुधार का भाव आना चाहिए। हर चीज,हर क्रिया, हर व्यक्ति के लिए नहीं होती। आप एक ही चीज कीजिए और पूरे भाव से कीजिये, आपको सफलता अवश्य मिलेगी। उन्होंने कहा कि वह बिरली आत्मा ही होगी जिसका कि सभी कामों में मन लगे।
मुनि श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि आप पहले एक चीज में मन लगाओ और उसे पूरा करो। उसके पूरा होने के बाद ही दूसरी चीज करने की ऒर ध्यान दो। कोई भी कार्य करो पूरे भाव से करो। सारी चीजों को करने की कोशिश मत करो।उन्होंने कहा कि तकलीफों से मत घबराओ, हर किसी के जीवन में तकलीफें आती ही है।
आप तकलीफोँ से मत भागो बल्कि इसका सामना करो। आखिर आप तकलीफों से कब तक भागोगे एक न एक दिन इसका सामना आपको करना ही पड़ेगा। कष्ट से भय मत करो बल्कि उसे समता से सहन करो ताकि कोई नये कर्मबंध न हो। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।
हर घटना के पीछे सार है
मुनि श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि हर घटना के पीछे सार है। उस सार को समझो, पकड़ो और अपने जीवन में उतारकर उसे सफल बना लो। उन्होंने कहा कि हम प्रवचन सुनते आ रहे हैं लेकिन हम में क्या सुधार हुआ?बाहरी आचरण में तो आप सुधार ला लोगे, अंतर्मन में भी सुधार लाएं तो जीवन सफल हो जाये ।

