राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 24 सितम्बर। ” अपने विचारों के साथ-साथ हमें दूसरे के विचारों को भी महत्व देना चाहिए। हमारे दिमाग में केवल हमारा ही विचार रहता है इसलिए हम दूसरों के विचारों को महत्व नहीं देते, किंतु हम यह भूल जाते हैं कि एक ” दीये ” के पास दूसरा ” दीया ” जलाने से रोशनी और बढ़ती है!” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने फरमाया कि जब एक विचार दूसरे विचार से मिलते हैं तो वे और भी पुख्ता हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति अशांत नहीं होना चाहता। झगड़ा देखने में तो लोगों को मजा आता है किंतु झगड़ा करने में नहीं।
मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि आप पहले सामने वाले व्यक्ति की बात को सुनो, उनके विचारों को समझें फिर कोई प्रतिक्रिया दें । उन्होंने कहा कि आप अपना नजरिया बड़ा करो। यदि हमारा नजरिया बदलेगा तो हमारा एक दूसरे के प्रति द्वेष का भाव भी समाप्त होगा। हम सामने वाले व्यक्ति को स्वीकारकरें और उसका नजरिया जानकर फैसला लें।
मुनि श्री ने आगे कहा कि हमारे बोलने से किसी का नजरिया नहीं बदल जायेगा। अगर कुछ बदलना हो तो खुद का नजरिया बदलें। सामने वाले के विचारों का सम्मान करें और उसके बाद कोई कार्य करें। यदि आप ऐसा करते हैं तो निश्चित ही आपका जीवन आनंद से भर जाएगा।

