राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 10 जुलाई। श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य श्री वीरभद्र ( विराग ) मुनि जी ने आज यहां कहा कि सदा सुखी रहना तो आध्यात्म की ओर बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि आप अपनी सोयी चेतना को जगाने का प्रयास करें, आध्यात्मिक इच्छा शक्ति जागृत करें। सम्यक धारणा रखें और तत्वज्ञान रखें।
जैन उपाश्रय भवन में आज अपने नियमित प्रवचन में जैन संत श्री वीरभद्र (विराग) मुनि ने कहा कि तत्वज्ञान यदि हो जाए तो सम्यक धारणा अपने आप आ जाएगी। मुनि श्री ने कहा कि 10 साल पहले आपने किसी को उधार दिया है, वह याद रहता है। किसी ने कटु वचन कहा है, वह याद रहता है किंतु पिछले चातुर्मास में मुनि श्री ने क्या कहा, वह याद नहीं रहता।
संकल्प विकल्प तभी तक है जब तक धर्म संज्ञान नहीं है, एक बार यदि धर्म संज्ञान हो जाए तो संकल्प विकल्प सभी धराशाई हो जाएंगे। आप अपने को पहचाने। आपके अंदर का जो चेहरा है, वही आपका वास्तविक चेहरा है। छोटी-छोटी भ्रांतियां दिमाग में बैठ जाती है तो व्यक्ति धर्म से चूकता जाता है। उन्होंने कहा कि भीतर की भ्रांतियां दूर करें और धर्म पथ पर बढ़ें।
मुनि श्री ने आगे कहा कि हिंसा हमेशा पाप नहीं होता, जिस हिंसा से स्वार्थ हटता है और परोपकार होता है, वह हिंसा नहीं रह जाता। जो राग है,वही पाप है। हमें क्रियाओ का धर्म आ जाए तो कषाय मजबूत नहीं हो पाएंगे। हमने तत्व को नहीं समझा इसलिए हम वास्तविक आत्मज्ञान से वंचित है।
तत्व समझ में आ जाएगा तो अंदर का विवेक जाग जाएगा। अंदर का विवेक जाग गया तो व्यक्ति को कर्म, पाप एवं पुण्य की समझ आ जाएगी, उसकी सारी कंफ्यूजन दूर हो जाएगी और वह सुखी हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि दरअसल हमने परमात्मा के तत्वों को समझा नहीं, यदि समझा होता तो जीवन में शांति होती। भीतर में कोई राग ना हो तभी व्यक्ति सुखी हो सकता है। अपने अंदर बदलाव लाएं। भीतर का अनासक्त भाव बाहर आ जाए तो भीतर शांति आ जाएगी।

