54 दिवसीय श्री उवसग्गहरं उत्सव चातुर्मास में आज से श्री आचारांग आगम प्रवचन माला प्रारंभ

54 दिवसीय श्री उवसग्गहरं उत्सव चातुर्मास में आज से श्री आचारांग आगम प्रवचन माला प्रारंभ

नगपुरा(अमर, छत्तीसगढ़) 11 जुलाई। श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ- नगपुरा में 54 दिवसीय श्री उवसग्गहरं उत्सव चातुर्मास में आज से श्री आचारांग आगम प्रवचन माला का प्रारंभ हुआ। भरूच निवासी गुरुभक्त मयूरभाई – स्मिताबेन शेठ के चातुर्मासिक निवास स्थान से अत्यंत हर्षोल्लास के साथ बाजते गाजते आगम यात्रा एवं आगम वधामणा के साथ आगम ग्रंथ गुरुवर्याश्री को समर्पित किया गया I


तत्पश्चात् विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी लब्धियशाश्रीजी ने कहा कि,
प्रभु महावीर ने साढ़े बारह वर्ष की उग्र संयम साधना के बाद राग द्वेष से मुक्ति प्राप्त की- वीतराग बने । वीतराग बनते ही देवो द्वारा रचित भव्य समवशरण में विराजमान होकर प्रभु ने अपनी देशना का अमृत प्रवाहित किया I प्रभु के प्रधान शिष्य गणधर भगवंत की देशना सुनकर उसे सूत्र के रूप में संकलित करते हैं।

वे संकलित सूत्र ही जैन परिभाषा में आगम कहलाते है। कुल 45 आगमो में प्रभु महावीर की प्रथम देशना होने का गौरवपूर्ण स्थान आचारांग आगम को प्राप्त है। इस आगम ग्रंथ में वैचारिक शुद्धि द्वारा आचरण शुद्धि तक पहुंचने की प्रक्रिया बताई गयी है।

शुद्ध आचरण व्यक्ति की मानसिकता का परिचायक होता है। व्यवहार में मर्यादा और विवेक अत्यंत जरूरी है। जहाँ मर्यादा का पालन एवं विवेक बुद्धि से निर्णय लिए जाते हैं, वहाँ समन्वय सहजता से हो जाता है। मर्यादा एवं विवेक के अभाव में विवाद उत्पन्न होते हैं। प्रभु महावीर ने विवाद को खत्म कर संवाद साधने का मार्ग प्रशस्त किया I
साध्वीश्री ने ध्यान साधना हेतु चातुर्मास आराधको को प्रेरित करते हुए कहा की, सभी तीर्थंकरो की प्रतिमा ध्यान अवस्था में ही पाई जाती हैं क्योंकि तीर्थंकर प्रभु साधना काल में अपना अधिकतम समय ध्यान में ही लीन रहते हैं I यहाँ उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ मे अनेक अशोक वृक्ष है। इन वृक्षों के नीचे बैठ कर ध्यान साधना करने से व्यक्ति शोक- विषाद एवं व्यर्थ की चिंताओ से मुक्त बनता है। तीर्थंकर प्रभु स्वयं अशोक वृक्ष के नीचे बैठ कर ही उपदेश दिया करते हैं। ध्यान द्वारा साधक प्रभु की ऊर्जा की अनुभूति कर सकते हैं I
साध्वीश्री ने कहा की ,प्रभु महावीर ने अधिकांश देशना मालकौश राग में ही प्रदान की क्योंकि इस राग में पत्थर को भी पिघलाने की शक्ति हैं I श्रोताओ के पत्थर जैसे कठोर हृदय को कोमल बनाने के लिए प्रभु इस राग का प्रयोग करते हैं। हमे भी प्रभु के वचनों का पुनः पुनः स्वाध्याय कर अपने हृदय को कोमल बनाना चाहिए ।
शनिवार दोपहर को 3 बजे नागपुर से ज्ञानानंदी सुश्रावक जगदीशभाई सावड़िया द्वारा प्रतिक्रमण से परिणति विषय पर विशेष विवेचन किया जाएगा I

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