राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 20 जुलाई। जैन संत विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन उपवास रखकर पूरे देश में उपवास की नई दिशा दिखाने वाले प्रख्यात जैन संत वीरभद्र ( विराग ) मुनि जी ने आज अपने नियमित प्रवचन के दौरान तप और उपवास के महत्व को बताया।
उन्होंने कहा कितप और उपवास कर आत्मा को जगाइए और पहचानिए कि शरीर और आत्मा में क्या भेद है। उन्होंने कहा कि दृढ़ निश्चय के साथ तप और उपवास करें तो आपका तप और उपवास अवश्य सफल होगा।
जैन बगीचा स्थित नए विशाल हाल में आज जैन संत वीरभद्र ( विराग ) जी ने कहा कि जीव तू आत्मा का कल्याण चाहता है तो इस शरीर से जितना रस निकालना चाहता है निकाल ले। अंतिम समय में यह शरीर इतना हल्का हो जाए कि लोगों को उठाने में भी तकलीफ ना हो और जलाने में लकड़ी भी कम लगे।
उन्होंने श्रावकों से कहा कि मनुष्य भव में आए हो तो आप आत्मा की शक्ति को पहचानिए। अभ्यंकर तप का प्रयास कीजिए। मुनि श्री ने कहा कि तप मात्र परम निद्रा के लिए करें ना कि यश के लिए। दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ तप करें ताकि तप सफल हो। परम निद्रा की अनुभूति स्वयं को होनी चाहिए।
मुनि श्री ने फरमाया कि तप के द्वारा आत्मा और शरीर के भेद को पहचाने। अस्तित्व की गारंटी नहीं है किंतु एक बार तप और उपवास का संकल्प लिया हो तो उसे पूरा करने का ध्येय होना चाहिए। तप और उपवास, हृदय कठोर बनाकर और मन को निर्मल बनाकर करें।
उन्होंने कहा कि मन बार-बार भटक जाता है इसलिए उसे निर्मल बनाना बहुत जरूरी है।तप और उपवास करते समय खुद के साथ धोखा न करें। तप और उपवास करते समय यदि मन की मजबूती रही तो तप और उपवास को आगे बढ़ाएं। मुनि श्री के प्रवचन के बाद इंदौर से आए विपिन भाई बागरेचा ने सिद्धि तप का मंगल विधान किया।

