हमारे जीवन में पुण्यों का संचय करने का अवसर चातुर्मास- कुमुदलता जी… राग को छोड़ वितरागता के मार्ग पर बढ़ता ही सच्ची भक्ति -महाप्रज्ञाजी

हमारे जीवन में पुण्यों का संचय करने का अवसर चातुर्मास- कुमुदलता जी… राग को छोड़ वितरागता के मार्ग पर बढ़ता ही सच्ची भक्ति -महाप्रज्ञाजी

भीलवाड़ा राजस्थान (अमर छत्तीसगढ) ,21 जुलाई। चातुर्मास जीवन में पुण्यों का संचय करने का अवसर लेकर आता है। पुण्य से राजा श्रेणिक की तरह सत्ता भी मिलती है ओर शालिभद्र जैसी समृद्धि भी प्राप्त हो सकती है। हमारे पुण्य इतने प्रबल हो जाए कि हमे श्रेणिक जैसी सत्ता ओर शालिभद्र जैसी समृद्धि दोनों एक साथ प्राप्त हो जाए। इन दोनों ने महावीर के समोवशरण में तीर्थंकर गौत्र का बंध किया।

ये विचार अनुष्ठान आराधिका ज्योतिष चन्द्रिका महासाध्वी डॉ. कुमुदलताजी म.सा. ने सोमवार को आध्यात्मिक चातुर्मास आयोजन समिति द्वारा सुभाषनगर श्रीसंघ के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि आप पुण्यशाली व भाग्यशाली है कि चातुर्मास में भगवान महावीर की वाणी ओर गौतमस्वामी के आगम श्रवण करने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है।

स्वर साम्राज्ञी महासाध्वी महाप्रज्ञाजी म.सा. ने भक्ति के महत्व पर चर्चा करते हुए भक्ति ओर भोग एक साथ नहीं हो सकते। भोग से त्याग नहीं हो सकता ओर कर्म बंध होते है।

मुक्ति पानी है तो भोग छोड़ भक्ति के मार्ग पर जाना होगा। राग को छोड़ वितरागता के मार्ग पर बढ़ता ही सच्ची भक्ति होती है। भक्ति दिखावटी नहीं होकर सच्ची हो जाए तो गौतमस्वामी की तरह लब्धि प्राप्त हो जाए।

उन्होंने कहा कि हमारी कथनी ओर करनी में बड़ा अंतर होने से ही संसार सागर से पार नहीं हो पाते है। इनमें एकरूपता हो जाए तो आत्मा परमात्मा बन सकती है।

साध्वीश्री ने अभिमान से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि अभिमान बर्बादी का कारण बनता है लेकिन स्वाभिमान मरते दम तक नहीं छोड़े। जीवन में तीने बाते जिज्ञासा,ज्ञान ओर भक्ति होना जरूरी है। जिज्ञासा से ज्ञान की प्राप्ति होती है ओर ज्ञान से भक्ति की तरफ बढ़ते है। भक्ति के बल पर जन्मों के ताप ओर संताप मिट जाते है।

उन्होंने भीलवाड़ावासियों विशेषकर सुभाषनगर संघ के श्रावक-श्राविकाओं की सेवा भक्ति की सराहना करते हुए कहा कि यहां जगह भले छोटी हो पर दिल बहुत बड़े है ओर इसी सेवा भावना के कारण पूरे देश में सुभाषनगर चातुर्मास की चर्चा है। उन्होंने प्रवचन के दौरान प्रेरणादायी भजनों की प्रस्तुति भी दी।

धर्म करने से कर्म निर्जरा होती है जबकि सेवा करने से पुण्यार्जन

प्रवचन के शुरू में विद्याभिलाषी साध्वी राजकीर्तिजी म.सा. ने सुखविपाक सूत्र का वाचन करते हुए कहा कि हमने पिछले जन्मों में कुछ अच्छे कर्म किए होंगे जो मानव भव प्राप्त हुआ। अब मानव भव में कर्म निर्जरा करें ताकि मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ सके। धर्म ओर सेवा अलग-अलग है।

धर्म करने से कर्म निर्जरा होती है जबकि सेवा करने से पुण्यार्जन होता है। हमे कर्म खपाने के लिए धर्म ओर जिनवाणी का शरणा लेना चाहिए।

धर्मसभा में वास्तुशिल्पी साध्वी पद्मकीर्तिजी म.सा. का भी सानिध्य प्राप्त हुआ। चातुर्मास में महासाध्वी मण्डल की प्रेरणा से त्याग तपस्याओं का दौर निरन्तर जारी है।

धर्मसभा में कई श्रावक-श्राविकाओं ने पंचोला, तेला, बेला, उपवास, आयम्बिल, एकासन, तप के प्रत्याख्यान भी लिए। मुंबई से पधारे विरार संघ के महामंत्री प्रकाश सोलंकी, नीलू सोलंकी,गांधीधाम से पधारे चेनसिंह सुराणा, विमलादेवी सुराणा आदि अतिथियों का स्वागत आध्यात्मिक चातुर्मास आयोजन समिति एवं सुभाषनगर श्रीसंघ के पदाधिकारियों द्वारा किया गया।

धर्मसभा का संचालन चातुर्मास समिति के सचिव राजेन्द्र सुराना ने किया। प्रभावना के लाभार्थी विरार से पधारे प्रकाश सोलंकी एवं परिवार रहा। धर्मसभा में भीलवाड़ा शहर एवं आसपास के विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रावक-श्राविकाएं मौजूद थे। नियमित चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.45 से 10 बजे तक हो रहे है।

बच्चों के लिए धार्मिक संस्कार शिविर का आयोजन

चातुर्मास के तहत रविवार दोपहर सुभाषनगर स्थानक में बच्चों के लिए धार्मिक संस्कार शिविर का आयोजन किया गया। विद्याभिलाषी साध्वी राजकीर्तिजी म.सा. के सानिध्य में आयोजित शिविर में करीब 200 बच्चें शामिल हुए और जैन धर्म ओर संस्कारों से जुड़ा ज्ञान प्राप्त किया। शिविर में साध्वीश्री ने बच्चों की जिज्ञासाओं का भी समाधान किया ओर उन्हें हर रविवार दोपहर इस शिविर में आने के लिए प्रेरित किया।

निलेश कांठेड़
मीडिया प्रभारी

Chhattisgarh