महावीर की जिनवाणी- मानव भव सफल बनाना है तो सादी, सरल जिन्दगी की शुरूआत छोटे-छोटे तप से- साध्वी मंजुला श्रीजी

महावीर की जिनवाणी- मानव भव सफल बनाना है तो सादी, सरल जिन्दगी की शुरूआत छोटे-छोटे तप से- साध्वी मंजुला श्रीजी

रायपुर (अमर छत्तीसगढ) 22 जुलाई। शासन दिपिका साध्वी मंजुला श्री जी ने हर जीव की आत्म जागृति पर प्रकाश डालते हुए बताया हैं हे भव्य उपासकों- एक राजा चार्तुमास काल में आचार्य के सम्पर्क में आया वह उनके जीवन एवं जिनवाणी से बहुत प्रभावित हुआ। आचार्य के पाँच सौ शिष्य थे। वह गुरू से बहुत प्रभावित थे। एक बार आचार्य अस्वस्थ हो गये राजा को चिंता हुई कहा मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं।

राजा ने कहा वह बल वैद्यराज की औषधी से बीमारी स्वस्थ हो जाएगी। आचार्य श्री ने हस्ते हुए कहा-राजाजी मेरे पास भी एक दवा है जो जीवन को सदा-सदा के लिये सफल बना देगी। राजा प्रभावित हो पूछे कौन सी दवा गुरूदेव, गुरूदेव ने कहा “तपस्या की।

हे भव्य उपासकों वर्षावास में भगवान महावीर की जिनवाणी यही संदेश दे रही हैं-परमात्मा महावीर ने जीवन सफल बनाने के बारह प्रकार के तप बताए हैं- ये दवा ही सिद्धी तक ले जाती है ज्ञानीजन कहते है जैसे तप सिद्धी के लिये जरूरी होता है

वैसे ही मानव तप-तप कर मेहनत कर हर चीज प्राप्त करता है जीवन सफल बनाने के लिये परमात्मा महावीर ने आहार संज्ञा पर कंट्रोल कर वह नवकारसी तप से शुरूवाद करें यह तप करने से इसका लाभ बताया- नरक में जितने काल दुःख भोगने अशुभ कर्म नष्ट होते है उनमें नवकारसी करने से आपके 100 वर्ष के कर्म नष्ट हो जाते है ये छोटे तप से आगे तपों में धीरे-धीरे बढ़ते चले जाओगे। फिर आप कर्मों को क्षय कर सिद्धी पा सकते है। ये बारह प्रकार के तप जीवन को सफल बना देगा।

हे भव्य उपासकों- आपके पूर्वज सदा वर्षावास में एवं साधु साध्वी की सेवा में अग्रणी रहते थे। वे सेवा भी करते तप-त्याग भी करते। परमात्मा की जिनवाणी सुनने का वे कभी अवसर नहीं चूकते। वे पूरी श्रद्धा भाव से सेवा करते।

आज के युग की संस्कृति और मोबाईल आदि में ऊपरी ज्ञान से बच्चे आदि क्यो भटक रहे है? चिन्तन का विषय है। माता-पिता कहते है तुम अच्छी पढ़ाई कर अच्छे नंबर पा लोगे तो गाड़ी दिला दूंगा। मोबाइल आदि दिला दूंगा। परमात्मा महावीर की जिनवाणी कह रही है- मानव भव सफल बनाना है तो सादी, सरल जिन्दगी की शुरूआत छोटे-छोटे तप से जीवन को संयमित बनाते जाओ। मानव जीवन ही ऐसा है तो तप कर सकता है। देवता लोग भी इस तप के लिये तरसते है।

हे भव्य उपासकों- धन्ना की प्रसन्नता से तीनो भाई की ईर्ष्या बढ़ गई। पिताजी से कहा हमने भी मेहनत की कमा नही पाए। धन्ना ने तो सेठ ईश्वर प्रसाद के पत्र को पढ़कर ये कार्य कर कमाई की है।

पिताजी ने सोचा ये तीनो धन्ना की पुण्यवाणी से घबरा कर उसका हर कार्य उल्टा ही उल्टा सोचते है। जबकि उन्हें धन्ना के कार्यों से प्रशंसा करनी चाहिये। आगे पिताजी तीनो बेटो को कहानी के माध्यम से पूरी बात समझाने में

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