नगपुरा दुर्ग (अमर छत्तीसगढ़) 26 जुलाई । श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा में चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में श्री आचारांग सूत्र के आलम्बन से साध्वी श्री आज्ञायशा श्री जी म० सा० ने फरमाया कि जो विनम्रता का पालन करता है, नम्रता को धारण करता है, वह सभी को जीत लेता है।
विनम्रता सारे सद्गुणों की नीव हैं। नम्रता एक महत्त्वपूर्ण गुण है, जो किसी व्यक्ति के व्यक्त्तित्त्व को उच्च स्तर पर ले जाता है। नम्र व्यक्ति अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ नहीं समझता बल्कि दूसरों की बातों और भावनाओं का सम्मान करता है।
चातुर्मास आराधकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि नम्रता का अर्थ है. विनम्र, शांत और आज्ञाकारी होना। नम्रता ऐसा गुण है जिसमें व्यक्ति अपनी शक्ति को नियंत्रित करता है। दूसरों के साथ सम्मान और सहानुभूति से पेश आता है।

जो दूसरों का सम्मान करता है, उन्हें सभी सम्मान देते है। नम्र व्यक्ति सभी के लिए आदर का पात्र होता है ।नम्र व्यक्ति अपने गलतियों को सहज स्वीकारता है और दूसरों से सीखने का प्रयास करता है। नम्र व्यक्ति दूसरों की गलतियों को सहन करता है और उन्हें माफ भी कर देता है।
नम्रता रूपी सद्गुण में क्षमा भी समाहित हो जाता है। जीवन में नम्रता का बहुत महत्त्व है, नम्रता ही आदमी को महान बनाता है। नम्रता का सबसे बड़ा कार्य अहंकार का नाश करना है! जब व्यक्ति अहंकार से भर जाता है, तो वह दूसरों को तुच्छ समझने लगता है, उनकी भावनाओं को अनदेखा करने लगता है, स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगता है।

नम्रता इस अंधकारमय अहंकार में दूर करके व्यक्ति के भीतर वास्तविक ज्ञान, समझ और करुणा की भावना विकसित करती है। नम्रता मन को शांत करती है। आत्मचिंतन और आत्म-मूल्यांकन की भावना को बढ़ाती है । नम्रता को अपनाएँ, अहंकार को छोड़े और जीवन को वास्तविक अर्थों में सफल बनाएँ। ऐसा हमारा प्रयास हो।

