व्यक्ति अनुकूलता चाहता है, कोई भी प्रतिकूल स्थिति का सामना नहीं करना चाहता… आत्म कल्याण करना है तो क्रोध, मान, माया व लोभ त्यागना होगा- मुनि वीरभद्र

व्यक्ति अनुकूलता चाहता है, कोई भी प्रतिकूल स्थिति का सामना नहीं करना चाहता… आत्म कल्याण करना है तो क्रोध, मान, माया व लोभ त्यागना होगा- मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 8 अगस्त। जैन संत श्री विनय कुशल मुनि जी के सुशिष्य एवं तपस्वी संत श्री वीरभद्र(विराग) मुनि ने कहा कि किसी भी जीव को अपनी आत्मा का कल्याण करना है तो एक ही काम करना पड़ेगा और वह काम है क्रोध, मान, माया और लोभ इन चारों कषायों का त्याग। जब तक यह अपने भीतर से बाहर नहीं निकलेंगे तब तक आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता।


मुनि श्री वीरभद्र (विराग)जी ने आज अपने नियमित प्रवचन में कहा कि अपने भीतर के अवगुणों को खत्म करो। अवगुण जब तक खत्म नहीं होंगे तब तक आत्म कल्याण के मार्ग में हम बढ़ नहीं सकेंगे। उन्होंने कहा कि मनुष्य अनुकूलता चाहता है, वह प्रतिकूलता से बचना चाहता है।

हम परमात्मा के दर्शन के लिए जाते हैं तो वहां भी हम अनुकूलता ढूंढते हैं, वहां हम सुविधाजनक स्थान देखते हैं जहां से हम आसानी से परमात्मा के दर्शन कर सकें। हमें वहां भी अनुकूलता की चिंता रहती है जिस परमात्मा के दर्शन के लिए गए हैं उसकी ओर ध्यान नहीं रहता।


मुनि श्री वीरभद्र( विराग ) जी ने कहा कि मनुष्य जहां भी जाता है उसे स्वाद, स्थान आदि की अनुकूलता की चिंता रहती है। वह हर समय अपनी अनुकूलता का ध्यान रखता है। प्रतिकूल स्थिति का वह सामना नहीं करना चाहता। बीमार होने से पहले ही वह दवाइयां ला लेता है, स्वास्थ्य बीमा करा लेता है।

उन्होंने कहा कि तबीयत बिगड़ने से मेडिकल स्टोर घर में नहीं लाया जाता है बल्कि वहां जाया जाता है। उन्होंने कहा कि हमें परमात्मा के आदेशों का पालन करना है तथा धर्म ध्यान करते हुए आत्म कल्याण के मार्ग की ओर बढ़ना है।

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