वाणी का संयम, मितभाषण जीवन में जरूरी- साध्वी श्री लब्धियशाश्रीजी

वाणी का संयम, मितभाषण जीवन में जरूरी- साध्वी श्री लब्धियशाश्रीजी

नगपुरा दुर्ग (अमर छत्तीसगढ) 8 अगस्त। जीवन में अल्पभाषिता का मितभाषण का मूल्य है। आदमी के जीवन का सबसे बड़ा काम बोलना है। वह जरूरत होती है तो भी बोलता है और जरूरत नहीं होती है तो भी बोलता है। कोई पूछता है तो भी बोलता है । बिना पूछे पंचायती करने वाले भी बहुत होते हैं,। व्यक्ति अनावश्यक भी बहुत बोलता है । वाणी का संयम, मितभाषण जीवन में जरूरी है।

कम बोलने का प्रयास करना चाहिए। जरूरत के बिना बिल्कुल नहीं बोलना चाहिए। जरूरत होने पर भी बहुत संयत बोलें, सीमित बोलें। जिस व्यक्ति ने कम बोलना शुरू कर दिया, उसने जीवन की गहराई को समझना शुरू कर दिया।
उक्त उद्गार श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ -नगपुरा में चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में साध्वी श्री लब्धियशाश्रीजी म सा ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति जितना ज्यादा बोलता है, उसका जीवन उतना ही छिछला होता चला जाता है । जो ज्यादा बोलता है, उसका मूल्य कम होता है ।

जो कम बोलता है, उसका बहुत मूल्य होता है। जो कम बोलता है, लोग उसे सुनना चाहते हैं। जो सारे दिन बोलता रहता है, उसे लोग सुनना पसंद नहीं करते ।
वाणी का संयम बहुत आवश्यक है ।

साधना आराधना काल में मौन करना बहुत अच्छा है । यदि इतना न कर सकें तो कम से कम अनावश्यक बातचीत न करें, घरेलू बातें न करें । व्यापार-व्यवसाय की बात न करें। इस स्थिति में ही साधना आराधना की गहराई में पहुंचा जा सकता है।

वस्तुत: मौन रहना कठिन है । जब मन में विचारो‌ की तरंग उठती है, ज्वार आता है तब व्यक्ति से बोले बिना रहा नहीं जाता ।

अनावश्यक न बोलें, बिना मतलब न बोलें, अधिक न बोलें, दिन में कम से कम घंटा, दो घंटा मौन रखें। इतना अभ्यास होता है तो वह जीवन के लिए बहुत अच्छा होता है ।

आज चातुर्मास आराधकों ने एक दिन के मोबाइल का त्याग के साथ मौन साधना किए। श्री पद्मावती माता को अष्टोत्तरी मंत्र के चुनरी समर्पण किए ।

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