देशनोक राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़ ) 24 अगस्त। श्री जैन जवाहर मण्डल प्रांगण में धर्म सभा में परम श्रद्धेय आचार्य श्री 1008 रामलालजी म.सा. एवं उपाध्याय प्रवर श्री राजेश मुनिजी म.सा. एवं शासन दीपक श्री प्रकाश मुनिजी एवं श्री विनय मुनिजी आदि ठाणा एवं साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका के समोशरण में शासन दीपक शोभनमुनिजी पर्युषण पर्व के पांच वे दिवस पर अन्तगडदसाओ सूत्र के तृतीय और चतुर्थ एवं पंचम वर्ग पाठ का वांचन करते हुए धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कृष्ण वासुदेव अरिहंत अरिष्टनेमि से पूछा वह पुरुष कौन है जो मेरे भाई कि जिसने अकाल मौत कर दी।
अरिहंत अरिष्टनेमि ने कहा कृष्ण वासुदेव जब तुम द्वारिका नगरी में प्रवेश करोगे तब वह तुम्हे देखकर मृत्यु को प्राप्त होगा वही वह पुरुष है। सोमिल ब्राहण अपने घर से निकलते है। द्वारिका नगरी में कृष्ण को देख वह डर जाता है और खड़े-खड़े ही वह मृत्यु को प्राप्त होता है।
उस काल उस समय में द्वारिका नगरी में वासुदेव कृष्ण की पदमावती महारानी थी। नन्दनवन उद्यान में अरिहंत अरिष्टनेमि भगवान पधारे उनके दर्शनार्थ वासुदेव कृष्ण और पदमावती महारानी उपस्थित हुए और वहां धर्म देशना सुनी।
कृष्ण यासुदेव ने अहिंत अरिष्टनेमि से पूछा द्वारका नगरी का विनाश किस कारण से होगा? भगवान अरिष्टनेमि ने कहा कृष्ण वासुदेव द्वारिका नगरी का विनाश सुरा, अग्नि एवं द्वैपायन ऋषि के कारण होगा।
यह सुनकर कृष्ण वासुदेव ने कहा मैं आपके पास दीक्षा नहीं ले पा रहा हूं। अरिहंत अरिष्टनेमि ने कहा कृष्ण वासुदेव के पूर्वभव में निदान किया हुआ होता है। इसलिए वासुदेव भूतकाल में दीक्षीत हुए है न वर्तमान काल में दीक्षीत होंगे। कृष्ण वासुदेव ने अरिहंत अरिष्टनेमि से पूछा यहां से मृत्यु के समय काल करके कहां जाउंगा?
भगवान अरिष्टनेमि ने कहा द्वारिका नगरी जल जाने पर तुम सबसे रहित होकर तुम कौशाम्बवन उद्यान में श्रेष्ठ वटवृक्ष के नीचे पृथ्वीशिला रूपी पट्ट पर पीताम्बर (पीलेवस्त्र) से शरीर ढका होने पर जराकुमार के द्वारा धनुष से छोड़े गए लक्ष्य बाण से बाएं पैर के बंध जाने पर काल करके तीसरी बालुका प्रभा नामक पृथ्वी में उत्पन्न होगे।
यह सुनकर वासुदेव कृष्ण आर्तध्यान करने लगे तब भगवान अरिष्टनेमि ने कहा तुम्हारा जम्बूद्वीप नामक द्वीप में भरत क्षेत्र में आगामी बारहवें अमम नामक तीर्थकर बनोगे। यह बात सुनकर कृष्ण वासुदेव सिंह के समान गर्जना करते हुए वन्दना करते है और अपने द्वारिका नगरी की तरफ प्रस्थान कर लेते हैं।
कृष्ण वासुदेव द्वारिका नगरी में घोषणा करवाते हैं यह नगरी का विनाश हो जायगा। जो कोई राजकुमार सेठ रानी अरिहंत अरिष्टनेमि के पास दीक्षा लेगा उसे कृष्ण वासुदेव अनुमति देते हैं ।
पटरानी पदमावती महारानी के भावों को जानकर कृष्ण वासुदेव भगवान अरिष्टनेमि के पास दीक्षा दिलाने की अनुमति देते है और पदमावती देवी दीक्षा ले सिद्ध गति को प्राप्त करती है। इस प्रकार पंचम वर्ग का 9-10 अध्ययन पूर्ण हुआ।

