राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 16 सितंबर।श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज कहा कि इस जगत में सुख को कितना भी ढूंढ लो,वो मिलने वाला नहीं है, क्योंकि सुख तो अपने भीतर ही है।
हम सुख बाहर ढूंढते फिरते हैं, जब तक मन हमारा शांत और संतोष से भरा नहीं होगा तब तक हम भीतर के सुख को प्राप्त नहीं कर पाएंगे।
जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में आज मुनि वीरभद्र (विराग) ज़ी ने कहा कि अंधा व्यक्ति जो आंखों के सामने है उसे देख नहीं पाता किंतु रागी व्यक्ति जो आँखों के सामने नहीं है वह भी अपनी काल्पनिक आंखों से देख लेता है।
उन्होंने कहा कि जुआ- सट्टा से कोई बना नहीं है, इस रास्ते जिसने पैसा कमाया भी है तो भी वह सुखी नहीं है। इस रास्ते कमाया गया पैसा निश्चित तौर पर दुखों को आमंत्रण देता है। इस रास्ते पर चलने वाले के पास जो भी होता है, वह उसे गवां देता है।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि जहां सुख नहीं है वहां हम सुख को खोज रहे हैं और जहां सुख है वहां हम देखते भी नहीं है। हर चीज को बदलने वाला व्यक्ति अपने स्वभाव को ही नहीं बदल पाता।
दरअसल हम अपना स्वभाव बदलना ही नहीं चाहते। उन्होंने कहा कि हम अपना स्वभाव इसलिए नहीं बदलना चाहते क्योंकि कहीं ना कहीं हम अपने स्वभाव के प्रति आकर्षित रहते हैं। मुनि श्री ने कहा कि आराधना का फल मोक्ष है। चिंता मत करो और आराधना के जरिए मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ चलो।यह जानकारी विमल हाज़रा ने दी ।

