ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 23 मार्च।
(प्रकाश जैन)
एल एस प्रोडक्शन के बैनर तले रविवार को राजधानी के आँगन होटल, जयपुर में राजस्थानी फिल्म सेमिनार का आयोजन किया गया जिसमें क्षेत्रीय फिल्मों के पचपन से अधिक निर्माता-निर्देशकों सहित करीब सौ कलाकारों व तकनीशियनों ने राजस्थानी सिनेमा की दुर्दशा पर मंथन कर इसको संकट से उबारने की दिशा सें चर्चा की।
सेमिनार में वर्ष 2026 में निर्मित और रिलीज होने वाली 09 राजस्थानी फिल्मों की भी घोषणा की गई जिससे इस वर्ष में राजस्थानी सिनेमा के स्वर्णिम युग की संभावनाएं जागी है।
सेमिनार के मुख्य अतिथि निर्माता-निर्देशक एन एस मित्तल रहे जबकि अध्यक्षता निर्देशक लखविन्दर सिंह ने की। समारोह के विशिष्ठ अतिथि वरिष्ठ पत्रकार तथा भारतीय सांस्कृतिक निधि (इन्टैक) ब्यावर अध्याय के कन्वीनर रामप्रसाद कुमावत तथा जयपुर के समन्वयक भूपेंद्र राणा ने शिरकत की।
सेमिनार को संबोधित करते हुए रामप्रसाद कुमावत ने कहाकि राजस्थानी फिल्म कला एवं संस्कृति के विकास में सबसे बड़ी चुनौती राजस्थानी भाषा और बोली की उपेक्षा है। प्रदेश में राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं मिलने से इसको सरकारी संरक्षण नहीं मिल रहा।
राजस्थान साहित्य अकादमी एवं राजस्थानी भाषा अकादमी में अध्यक्ष की नियुक्ति तीसरे साल भी नहीं हुई और पाठ्यक्रम में भी इसे अनिवार्य नहीं किया गया।
सामान्य बोलचाल व घरों तक में इसे प्रमुखता से बोला नहीं जाता जिससे नई व युवा पीढ़ी इससे दूर हो रही है। जब राजस्थानी बोलना और लिखना ही नहीं हो रहा है तो इसका संगीत, सिनेमा और साहित्य कैसे समृद्ध होगा ?
श्री कुमावत ने कहाकि राजस्थानी फिल्मों की सफलता केलिए जरूरी है बेहतर, अच्छी और आकर्षक फिल्में बनाई जाए और इसके लिए जरूरी है कि दमदार कहानी हो, कहानी क्षेत्रीय परिवेश से जुड़ी हो, स्थानीय समस्या पर जोर देने की कोशिश हो, पारिवारिक रिश्तों, संस्कृति, लोक गीत व नृत्य की रंगीन खूबसूरती के साथ सशक्त एवं नवीन तकनीक का समावेश किया जाए, कुशल व अनुभवी निर्देशक व टीम का सशक्त अभिनय हो और राजस्थान की रंग-बिरंगी संस्कृति व कला का सुन्दर चित्रण करने के साथ यहां के गीत संगीत का मधुर, कर्णप्रिय व संवेदनशील प्रस्तुतीकरण के साथ साथ पर्याप्त बजट होना जरूरी है।
उन्होने ब्यावर जिले के अनेक ऐतिहासिक, धार्मिक तथा धरोहर की महत्ता वाले अनेक स्थलों का उल्लेख करते हुए निर्माता-निर्देशकों से कहाकि यदि आप अपनी फिल्मों में ब्यावर जिले की विरासत को कवरेज देकर फिल्मांकन करते हैं तो इन्टैक ब्यावर अध्याय आपको अपने खर्च पर सभी जरूरी सुविधाऐं उपलब्ध करायेगा। कुमावत के इस प्रस्ताव का सभागार में करतल ध्वनि से जोरदार स्वागत किया गया।
सेमिनार में समन्वय भूपेंद्र राणा ने बालीवुड (मुम्बई), हालीवुड (अमेरिका), टालीवुड़(तेलगू), मोलीवुड(मलयालम) तथा काॅलीवुड़ (बंगाली), गोलीवुड़ (गुजराती) केसाथ राॅलीवुड़ अर्थात राजस्थानी सिनेमा का तुलनात्मक विवरण पेश कर पिछले पच्चीस वर्षों में इसके पतन के कारणों पर प्रकाश डाला और बताया कि राजस्थानी फिल्मों का निर्माण ऐसे लोग कर रहे हैं जो अनुभवहीन हैं, जिनके पास इस इण्डस्ट्री में काम करने की कोई योग्यता, डिग्री, पूर्व प्रशिक्षण और अनुभव नहीं है।
कलाकारों का सही चयन नहीं करते तथा कथा व संवाद प्रभावी नहीं है बल्कि फिल्म बनाने का कोई मकसद साफ नहीं है। पर्याप्त बजट नहीं होता जिससे कलाकार, निर्देशक व कैमरामैन की टीम तक प्रोपर नहीं होती। ऐसे में दर्शक कैसे आकर्षित होगा ?
सेमिनार के मुख्य अतिथि एन एस मित्तल ने कहाकि उन्होंने चौदह राजस्थानी फिल्में बना दी मगर दर्शकों ने सिनेमाहाॅल में दर्शक ही नहीं पहुंचते। इन्डस्ट्री में एकजुटता का अभाव, टांगखिचाई, आपसी खींचतान, सरकारी उपेक्षा और अनुशासनहीनता के कारण बहुत परेशानी तथा बेवजह की थकावट से फिल्म की क्वॉलिटी प्रभावित होती है ।
जो अच्छी फिल्में बनाने का प्रयास भी किया गया, उसे भी दर्शकों का प्यार नहीं मिल रहा क्योंकि थियेटर मालिकों के नखरे भी मार रहे हैं।
फिल्म पाॅइन्ट जीरो के निर्माता-निर्देशक संदीप जैन ने कहाकि राजस्थानी सिनेमा, कला और संस्कृति के विकास हेतु सरकार की नीति में खामियां, पेचीदगिया, उदारता का अभाव तथा सहयोग की सकारात्मकता के अभाव से यह इण्डस्ट्री पिछड रही है।
यदि सरकार हर सिनेमाघर को सप्ताह में यदि एक शौ भी राजस्थानी का दिखाने हेतु बाध्य करदे और एक साल टेक्स फ्री की नीति बनाकर सहयोग कर दे, तो ही राजस्थानी सिनेमा में नवजीवन का संचार हो जायेगा।
उन्होंने सरकार की सब्सिडी नीति भी हताश करने वाली और प्रोत्साहन के नाम पर केवल दिखावटी करार देकर उसे सरल बनाने की मांग उठाई। वक्ताओं ने इसके लिए एकजुट होकर आन्दोलन करने का भी सुझाव दिया।
सेमिनार के आयोजक व निर्देशक लखविन्दर सिंह ने बताया कि प्रदेश में राजस्थानी सिनेमा की समस्या, चुनौती और समाधान की दिशा में इस आयोजन और संवाद के मंच से सामने आये विचारों ने निराशा भरे वातावरण में उम्मीद की लौ जलाने का काम किया है।
सेमिनार से अब संगठन को एकजुट होकर सरकार व प्रशासन से बातचीत की राह आसान हुई है और आने वाले दिनों में बेहतर करने के प्रयासों की सामूहिक ताकत को बल मिलेगा।
सेमिनार में निर्माता-निर्देशक राजेन्द्र सिंह शेखावत, हनुमान सहाय, गणेश साहू, उग्रसेन तंवर, राहत कुरैशी, शिखा त्यागी, आदितय त्यागी, शौकत कुरैशी, ललित राठौड़, ममता जैन, इशिका, सरोज कलवानिया, विजय स्वामी, धर्मेंद्र टाक, हनुमान सहाय, आबिद खान, संभव जैन सहित अनेक वक्ताओं ने अपने विचार रखे। अंत में मुम्बई से आये महेन्द्र कुमावत ने सभी का आभार जताया।

