सूरत अहमदाबाद (अमर छत्तीसगढ़) , 24 जुलाई। संसार की प्रत्येक वस्तु निरन्तर बदलती रहती है। शरीर भी निरन्तर बदलता रहता है। बचपन, जवानी, बुढ़ापा ये सब पुद्गल पदार्थ है निरन्तर बदलते ही रहते है। हम अपना भव सुधारना है तो संसार की पकड़ छोड़कर आत्मा को पकड़ना है। जिसको संसार से विरक्ति हो जाए वहीं साधक होता है।
ये विचार श्रमण संघीय आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनिजी म.सा. की आज्ञानुवर्तिनी एवं राजस्थान प्रवर्तिनी साध्वी शिरोमणी परम पूज्या सद्गुरूवर्या श्री यशकंवरजी म.सा.,आध्यात्म साधिका समतामूर्ति परम पूज्या सद्गुरूवर्या श्री सिद्धकंवरजी म.सा. की सुशिष्या संयम साधिका श्री संयम प्रभाजी म.सा. ने गुरूवार को श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ गोड़ादरा के तत्वावधान में महावीर भवन में आयोजित चातुर्मास ‘‘शुद्धता से सिद्धालय की ओर’ के तहत प्रवचन में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि हमे अपनी रोजी रोटी चले सके इससे ज्यादा पाप नहीं करना है। जीवन को व्यर्थ के पापो से बचाना होगा। पड़ौसी,कुटम्ब,परिवार हर जीव के प्रति हमारा मैत्री भाव होना चाहिए। उन्होंने छह द्रव्यों के विषय में समझाते हुए कहा कि सांसारिक वस्तुओं के प्रति अधिक मोह भाव नहीं रखना चाहिए।
प्रद्युनकुमार के चरित्र की चर्चा करते हुए कहा कि हमे हमेशा बड़ो के चरणों में ही बैठना चाहिए। जो शिष्य विनय भाव रखते हुए गुरू चरणों में समर्पिम हो जाता है उसे गुरू भी सच्चे मन से ज्ञान सिखाते है। गुरू वहीं होता है जो कभी अपने शिष्यों के साथ भेदभाव नहीं करता है। उन्होंने प्रवचन के दौरान मधुर भजन ‘‘मोक्ष मार्ग पर कदम बढ़ा ले’’ की भी प्रस्तुति दी।

धर्मसभा में मधुर व्याख्यानी श्री शशिप्रभाजी म.सा. ने कहा कि इस संसार में पंचेन्द्रिय जीव को ही मोक्ष गति प्राप्त हो सकती है यानि मनुष्य, पशु, पक्षी,नारकी ओर देवता आदि को। हमे अपनी आत्मा के समान दूसरों की आत्मा को भी समझना चाहिए। किसी अन्य जीवात्मा को दुःख देकर हम कभी सुखी नहीं बन सकते है। इसलिए दुःख देने पर दुःख ओर सुख देने पर सुख की प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा कि जो समता भाव से समझ रखता है वहीं सम्यक दृष्टि जीव होता है। सम्यक दृष्टि जीव संसार में रहने पर भी पाप नहीं करता है क्योंकि वह मोह,माया,रस का त्याग करता है। अन्तानुबंधी कषाय क्रोध, मान, माया, लोभ जीव को नरक गति में ले जाते है। हम भाग्यशाली है कि जिनवाणी सुनने को मिल रही है जिसे अमृत समझ ग्रहण करना चाहिए। धर्मसभा में स्वाध्यायशीला साध्वी श्री किरणप्रभाजी म.सा. का भी सानिध्य प्राप्त हुआ।

आचार्य आनंदऋषिजी म.सा. की जयंति के उपलक्ष्य में तेला तप आराधना
पूज्य महासाध्वी मण्डल के सानिध्य में गुरू वेणी अंबेश दरबार में निरन्तर तप त्याग व धर्म ध्यान की गंगा प्रवाहित हो रही है। श्रमण संघीय आचार्य सम्राट श्री आनंदऋषिजी म.सा. की 125वीं जयंति के उपलक्ष्य में तेला तप आराधना गुरूवार से शुरू हो गई। इसके तहत तेला तप करने की भावना रखते हुए 32 श्रावक श्राविकाओं ने उपवास के प्रत्याख्यान लिए।
श्रावक सुरेशचन्द्रजी चौधरी ने तेला तप के प्रत्याख्यान लिए। एकासन,आयम्बिल,उपवास की लड़ी निरन्तर चल रही है। साध्वी मण्डल ने सभी तपस्वियों की अनुमोदना करते हुए मंगलभावना व्यक्त की।
धर्मसभा में अतिथियों का स्वागत बहुमान गोड़ादरा श्रीसंघ द्वारा किया गया। प्रश्नोत्तरी, लक्की ड्रॉ एवं प्रभावना के लाभार्थी शूंभलालजी अजयकुमारजी सांखला परिवार (पहुंना वाले) ने लिया। संचालन श्रीसंघ के उपाध्यक्ष गौतमचन्दजी संचेती ने किया।
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श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ,गोड़ादरा,लिम्बायत,सूरत
प्रस्तुतिः अरिहन्त मीडिया एंड कम्युनिकेशन,

