जो अपने पर कंट्रोल नहीं रख सकता वह कोई भी कार्य सही नहीं कर सकता- मुनि वीरभद्र

जो अपने पर कंट्रोल नहीं रख सकता वह कोई भी कार्य सही नहीं कर सकता- मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 9 अगस्त। जैन संत श्री विनय कुशल मुनि जी के सुशिष्य एवं तपस्वी संत श्री वीरभद्र(विराग) मुनि ने कहा कि जितना सहज तरीके से चल सको चलो। शत्रु का कोई नाम व रूप नहीं होता। कोई भी कहीं से भी आकर दुख दे सकता है। जब तक स्वार्थ है तब तक दुख मिलता रहेगा।


जैन बगीचे के नए हाल में संत श्री वीरभद्र(विराग) मुनि ने कहा कि बाह्य पदार्थो में सुख ढूंढना बंद करें। जब तक बाह्य पदार्थो में सुख दिखाता रहेगा तब तक हम भटकते रहेंगे।

यह कल्पना का सुख है। वास्तविक सुख तो अंदर की है जिसे पाने के लिए हमें कषायों का त्याग करना होगा। बाहरी सुख देखते रहेंगे तो मोक्ष की ओर कैसे बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि जितने पाप का त्याग कर सके, करें। जितने नियमों का पालन कर सके,करें। पाप को त्याग कर और नियमों का पालन करने के बाद आप आंतरिक सुख की अनुभूति कर पाएंगे।


जैन संत ने फरमाया कि सम्यक दर्शन का कनेक्शन बाहरी दुनिया से नहीं है। इसका कनेक्शन मात्र और मात्र आत्मा से हैं। अपने अवगुणों को मारकर कषायों को खत्म करें। जब तक कषाय खत्म नहीं होंगे तब तक हम मोक्ष मार्ग में बढ़ नहीं सकते।

रोग आने का मुख्य कारण मन की अस्वस्थता है। क्रोधी व्यक्ति किसी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर सकता। जो व्यक्ति अपने पर कंट्रोल नहीं रख सकता वह व्यक्ति कोई भी कार्य सही नहीं कर सकता। आवेश जब बढ़ जाता है तब आप लोगों को सलाह नहीं दे सकते।

जब तक व्यक्ति क्रोध को नहीं छोड़ देता, उसका मन शांत नहीं हो सकता और वह साधना मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए क्रोध का त्याग करें और आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़े। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

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