बिलासपुर(अमर छत्तीसगढ़) 3 अगस्त । छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बार एसोसिएशन की ओर से आयोजित शोकसभा के आधार पर पूरे दिन न्यायिक कार्य स्थगित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि दिवंगत अधिवक्ता या न्यायिक अधिकारी को श्रद्धांजलि देना सम्मानजनक परंपरा है, लेकिन इसके कारण पूरे दिन अदालतों का कामकाज रोकना न्याय व्यवस्था और आम नागरिकों के न्याय पाने के अधिकार को प्रभावित करता है।
यह आदेश हाईकोर्ट के जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने रायपुर के 72 वर्षीय मकान मालिक की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
क्या है मामला?
रायपुर निवासी 72 वर्षीय बुजुर्ग छत्तीसगढ़ किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत बेदखली आदेश के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने रायपुर किराया नियंत्रक द्वारा 2 फरवरी 2026 को पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि जिला बार एसोसिएशन की शोकसभा के कारण उस दिन पूरे दिन न्यायिक कार्य स्थगित कर दिए गए और उनके मामले की सुनवाई अगली तारीख पर टाल दी गई। उन्होंने यह भी बताया कि शोकसभा, प्रशासनिक कारणों या पीठासीन अधिकारी की अनुपलब्धता के चलते बार-बार सुनवाई टलने से त्वरित न्याय का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि न्याय तक निर्बाध पहुंच संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि अधिवक्ता उपलब्ध नहीं हैं या शोकसभा आयोजित की गई है, न्यायिक कार्य पूरे दिन के लिए स्थगित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी दोहराया कि वकीलों की हड़ताल और कार्य बहिष्कार को पहले ही अवैध घोषित किया जा चुका है। ऐसे में शोकसभा के नाम पर न्यायिक कामकाज रोकना भी उचित नहीं माना जा सकता।
2 फरवरी का आदेश किया रद्द
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए रायपुर किराया नियंत्रक द्वारा 2 फरवरी 2026 को जारी उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत शोकसभा के कारण मामले की सुनवाई स्थगित कर दी गई थी।
हाईकोर्ट में पहले से है निर्धारित व्यवस्था
फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि हाईकोर्ट में किसी वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता अथवा महत्वपूर्ण न्यायिक हस्ती के निधन पर फुल कोर्ट रेफरेंस आयोजित किया जाता है। यह आयोजन सामान्यतः दोपहर 3:30 बजे या 3:45 बजे रखा जाता है, ताकि पूरे दिन का न्यायिक कार्य प्रभावित न हो और श्रद्धांजलि भी सम्मानपूर्वक दी जा सके।
हाईकोर्ट के इस फैसले को न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब रोकने और नागरिकों के त्वरित न्याय के अधिकार को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

