राजनांदगांव (अमर छत्तीसगढ़) 16 सितम्बर ।
श्री अग्रसेन भवन में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के चतुर्थ दिवस की कथा का रसपान व्यासपीठ से कराते हुए वृंदावन के सुप्रसिद्ध भगवताचार्य बांकेबिहारी गोस्वामी ने कहा कि इस संसार सागर में नौका हमारा शरीर है एवं मन हमारी डोर है । अपने मन की डोर को परमेश्वर के हाथों सौंपने पर नौका कभी डूबेगी नहीं और भवसागर से पार ले जावेगी ।
हम जिसके निमित्त जो प्रसाद तैयार करते हैं उसे ही अर्पण करना चाहिए अन्यथा वह ग्राहय नहीं है। एकादशी की व्याख्या करते हुए उसके नियमों को विस्तार से बताया और कहा कि एकादशी का पालन द्वादशी को करना चाहिए ।
एकादशी को शरीर छोड़ने वाले व्यक्ति का श्राद्ध कर्म द्वादशी तिथि करने का विधान शास्त्रों में आया है , मृतक आत्मा फलाहार ग्रहण नहीं करती । एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करना पाप है ।
पूज्य आचार्यश्री ने कथा विस्तार करते हुए सनातन धर्म की मीमांसा की । सनातन धर्म का मूल स्वरूप बताते हुए उसके क्या नियम है , क्या पालन करना चाहिए बताया । सनातन धर्म को परिभाषित करते हुए कहा कि सनातन धर्म के बीस साधारण नियम है ।
इसमें सत्य का आचरण करना, दया धर्म का पालन करना, एकादशी का व्रत करना, पुत्र धर्म का पालन करना, जिज्ञासु होना युक्तायुक्त विचार होना, सामर्थ्य के अनुसार कार्य करने वाला होना, दंभ अर्थात शक्ति सामर्थ से अधिक करना, अहिंसा जीव मात्र पर अहिंसा का व्यवहार करना, दान करना, कमाए हुए धन धर्म कार्य में लगाना, स्वाध्याय महाकाव्य गीता वेद पुराण भागवत का अध्ययन करना, सरलता – सहजता होना, संतोष रखना, सदपुरुषों की सेवा करना, सकाम कामों का त्याग, शांति एवं मौन रहना, आत्म चिंतन, प्राणी को अन्न दान करना, सभी में परमात्मा का दर्शन करना के साथ ही नवधा भक्ति को परिभाषित किया ।

पूज्य आचार्य श्री ने जीवन के चार आश्रम बताते हुए कहा कि ब्रह्मचर्य आश्रम , गृहस्थ आश्रम , वानप्रस्थ आश्रम एवं सन्यास आश्रम हमारे जीवन के महत्वपूर्ण बिंदु है । उक्त आश्रमों के अनुरूप जीवन जीने पर प्रभु की प्राप्ति होती है ।
ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अध्ययन करना , गृहस्थ आश्रम में श्राद्ध आदि कर्म हेतु पुत्रादि की कामना से गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए संतान उत्पत्ति करना । वानप्रस्थ आश्रम में द्वादश अक्षर ” ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ” मंत्र जाप करते हुए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करना एवं संन्यास आश्रम में सेवा कार्यों के माध्यम से जीवन व्यतीत करना ।
गृहस्थ आश्रम जीवन का महत्वपूर्ण आश्रम है , इसमें प्रभु भक्ति में लीन रहते हुए अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए दान, धर्म , प्रभु के प्रति भक्ति , दया , श्रद्धा , जप – तप आदि से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग शीघ्र प्रशस्त होता है ।
पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को पितरों के प्रति श्रद्धा रखते हुए श्राद्ध कर्म करना चाहिए। हमें मृतक तिथि के अनुसार ही प्राप्त करना शास्त्रों में बताया गया है । अनेक व्यक्ति दाग तिथि ( अंतिम संस्कार की तिथि ) के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं, उनके पितरों को भोज्य पदार्थ प्राप्त नहीं होता और पितृ भूखे रह जाते हैं ।
जिसका परिणाम व्यक्ति को धनाभाव एवं अस्वस्थता के रूप में प्राप्त होता है । एकादशी के दिन देह त्यागने वाले व्यक्ति का श्राद्ध कर्म द्वादशी तिथि को किए जाने का विधान है । एकादशी के दिन श्राद्ध कर्म करने वाला , श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने वाला एवं श्राद्ध के लिए सलाह देने वाला तीनों व्यक्ति दोषी माने गए हैं ।

पूज्य आचार्य श्री ने पितृ मोक्षार्थ आयोजित श्रीमद् भागवत कथा मैं पितृ कर्म के संदर्भ में कहा कि पितरों को तीन कार्य अति प्रिय है , पहले गाय के दूध से निर्मित खीर ग्रहण करना , जल में तिल डालकर किया गया तर्पण एवं तीसरा दोहित ( पुत्री का पुत्र ) के द्वारा श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने से पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं ।
श्राद्ध कर्म में चना दाल का बेसन वर्जित है , किंतु बेसन से निर्मित लड्डू का उपयोग किया जा सकता है । श्राद्ध कर्म में तोरई की सब्जी तथा उड़द दाल का उपयोग महत्वपूर्ण है । श्राद्ध कर्म की व्याख्या करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि श्राद्ध के दिन अपने अधीन कार्य करने वाले व्यक्ति एवं अंग भंग वाले व्यक्ति को पितृ के रूप में भोजन निषिद्ध बताया गया है ,सामान्य स्वरूप में भोजन कराया जा सकता है ।
श्राद्ध कर्म एकाग्र मन एवं चित्त से करना चाहिए , पितरों के प्रति श्रद्धा ही श्रद्धा है ।
पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि प्रभु के प्रति भक्ति निरंतर होनी चाहिए जिससे उसकी मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग सुलभ होता है । कुएं की रस्सी का उदाहरण देते हुए आचार्य श्री ने कहा कि बार-बार रस्सी कुएं में डालने से पाषाण युक्त पत्थर भी घिसकर रस्सी का निशान बना देते हैं , वहीं परमेश्वर तो बहुत सरल एवं कृपानिधान है शीघ्र मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं ।

कथा प्रसंग आगे बढ़ते हुए कच्छप अवतार की कथा की विवेचना की । वामन अवतार की सजीव झांकी ने भक्तों का मन मोह लिया । अमृत मंथन की कथा बताते हुए मंथन से निकले अमृत , विष , गौ माता , पारिजात फूल , महालक्ष्मी जी संहित घोड़े का वृतांत बताया ।
मोहिनी स्वरूप का वर्णन करते हुए अतिसुंदर मोहिनी अवतार की सजीव झांकी प्रस्तुत की गई । मत्स्य अवतार को व्याख्याित किया , गंगा अवतरण की कथा बताइ । कृष्ण जन्म का वृतांत बताते हुए वसुदेव – देवकी के स्वरूप की झांकी प्रस्तुत की गई । कृष्ण जन्मोत्सव मनाया गया , नन्हे से बाल स्वरूप में भगवान कृष्ण की नयनाभिराम सजीव झांकी की प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया ।
श्री कृष्ण जन्म प्रसंग आते ही श्रद्धालु भक्त नृत्य करने लगे , बधाइयां गई जाने लगी , बधाइयां बांटी गई । पूरा कथा स्थल “हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की” “नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की” के घोष से गुंजायमान हो गया ।

